छह ग्राफ़िक जिनसे आप जलवायु परिवर्तन को समझ सकते हैं

जानिए कैसे और क्यों धरती की जलवायु बदल रही है. ख़ास ऐसे समय में जब दुनिया भर के नेता पेरिस में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के मसौदे पर चर्चा करने के लिए मिल रहे हैं.

समस्या क्या है?

दुनिया गर्म हो रही है

धरती की सतह पर पिछले 100 साल में औसत तापमान 0.85 सेल्सियस की दर से बढ़ चुका है. 14 सबसे गर्म सालों में से 13 साल 21 वीं सदी में रिकॉर्ड किए गए हैं जबकि 2015 अभी चल रहा है.

बीसवीं सदी के औसत तापमान के साथ सालों की तुलना

दस सबसे गर्म साल हैं.

दस सबसे ठंडे साल हैं.

बीसवीं सदी का औसत तापमान है.

अधिक गर्म है.

अधिक ठंडा है.

स्रोत: एनओएए

क्या हो रहा है?

ग्रीनहाउस गैस, मुख्य तौर पर कार्बन डाईऑक्साइड

वैज्ञानिकों का मानना है कि उद्योग-धंधों और खेती से निकलने वाले गैस प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ा देते हैं. प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव सूर्य से मिलने वाली कुछ ऊर्जा को धरती के वातावरण में कैद कर के रखती है.

जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस को जलाने जैसी मानवीय गतिविधियों से कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) की मात्रा बढ़ रही है. कार्बन डाई ऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाली एक प्रमुख गैस है.कार्बन का अवशोषण करने वाले जंगल भी काटे जा रहे हैं.

पिछले आठ लाख सालों में धरती के वातावरण में इतना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड कभी नहीं रहा, इस साल मई महीने में सभी पिछले रिकॉर्ड टूट गए

CO2 की औसत मासिक सघनता. (पार्ट्स पर मिलियन)

आंकड़े स्क्रिप्स CO2 प्रोग्राम के, माउना लोआ ऑब्ज़र्वेटरी

इसका असर क्या होता है?

आर्कटिक सागर की बर्फ़ पिघल रही है

अधिक तापमान, मौसम की मार, बढ़ता समुद्री जल स्तर, ये सब धरती का तापमान बढ़ने के परिणाम हैं, इन सबका दुनिया पर काफ़ी गंभीर असर हो सकता है.

1900 से अब तक दुनिया में समुद्र का जल स्तर औसतन 19 सेमी बढ़ा है, पिछले कुछ दशकों में समुद्री जलस्तर के बढ़ने की गति तेज़ हो गई है, इसकी वजह से कम ऊँचाई पर बसे टापुओं और कई देशों के लिए ख़तरा पैदा हो गया है

ध्रुवीय बर्फ़ का पिघलना इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण है.

तेज़ तापमान की वजह से आर्कटिक सागर की बर्फ़ सिमट रही है, हालाँकि समुद्री जल के स्तर के बढ़ने में इसका योगदान मामूली है.

अगर 1980 के दशक के शुरुआती दौर के औसत स्तर से तुलना की जाए तो ब्रिटन से 10 गुणा बड़े क्षेत्र के बराबर समुद्री बर्फ़ अब तक पिघल चुकी है.

1980

1985

1990

1995

2000

2005

2010

2015

कनाडा
ग्रीनलैंड
रूस
यूनाइटेड किंग्डम
अमरीका
मीडियन (1981-2010)
समुद्र में बर्फ़ की सीमा न्यूनतम

आर्कटिक साागर के बर्फ़ का न्यूनतम स्तर, दस लाख वर्ग किलोमीटर --

Area chart showing the decline in sea ice from 1980 to 2015

स्रोत: नेशनल स्नो एंड आइस डेटा सेंटर

भविष्य में क्या होगा?

उच्च तापमान और ख़राब मौसम

संभावित असर की माप तय नहीं है

बदलावों की वजह से पानी की कमी, फ़ूड प्रोडक्शन पर असर पड़ सकता है बाढ़. इससे बाढ़, सूखे, लू और आंधी की वजह से हताहतों की संख्या बढ़ सकती है.

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से बार-बार मौसम में बदलाव होने की प्रक्रिया में तेज़ी आ सकती है. लेकिन किसी एक घटना को ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ा जटिल काम है.

तापमान में संभावित बदलाव (1986-2005 से 2081-2100)

अगर 2010-2020 के बीच ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ जाता है और फिर तेज़ी से कम हो जाता है ( आरसीपी2.6)

अगर ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन पूरी 21वीं सदी में बढ़ता ही रहा तो ( आरसीपी 8.5)

स्रोत: जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय पैनल- पांचवी मूल्यांकन रिपोर्ट (एआर5). नक्शे में दिखाई गई सीमाएं केवल सांकेतिक हैं, किसी सीमा विवाद की दृष्टि से इन्हें नहीं देखा जाना चाहिए.

क्या किया जा सकता है

सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले शीर्ष दस देश

सबसे ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करने वाले शीर्ष दस देश कुल उत्सर्जन का 70 फ़ीसदी उत्सर्जित करते हैं.

चीन 24%
अमरीका 12%
यूरोपीय संघ 9%
भारत 6%
ब्राज़ील 6%
रूस 5%
जापान 3%
कनाडा 2%
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो 1.5%
इंडोनेशिया 1.5%

स्रोत: कार्बन ब्रीफ़, आँकड़े 2012 के हैं

नुकसान को थामना

146 देशों ने उत्सर्जन को रोकने के लिए राष्ट्रीय जलवायु योजना पेश की है. उम्मीद है कि इससे जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक संधि की नींव रखी जाएगी.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2100 तक तापमान में औद्योगीकरण से पहले के तापमान के मुकाबले 2.7 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है

वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर दो डिग्री से ज़्यादा तापमान में बढ़ोतरी होती है तो इससे जलवायु में बड़े और ख़तरनाक परिवर्तन होगें जो गऱीबों पर ख़ास तौर पर बुरा असर डालेंगे.

2100 तक औसत तापमान वृद्धि

अगर देश कदम नहीं उठाते हैं
4.5
वर्तमान नीतियों को मानने पर
3.6
पेरिस योजना के आधार पर
2.7
2°C

स्रोत: क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर, डेटा क्लाइमेट एनालिटिक्स, इकोएफ़वाईएस, न्यू क्लाइमेट इंस्टीट्यूट, पोटसडैम इंस्टीट्यूट फ़ॉर क्लाइमेट इम्मपैट रिसर्च से लिया गया है

क्रेडिट

डिज़ाइन- एमिलि मैग्वायर और टॉम नर्स, डेवलपर- स्टीवन कॉनर और पुनीत शाह, लेखन और प्रोडक्शन--नासोस स्टाइलाइनो, पॉल रिंकन और जॉन वाल्टन

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