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शनिवार, 30 मई, 2009 को 08:16 GMT तक के समाचार
 
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जीते तो ज़िंदाबाद, लेकिन हारे तो...
 

 
 
गौतम गंभीर
एक मोटे अनुमान के अनुसार इस साल आईपीएल में 2000 करोड़ रुपये का निवेश हुआ

इंडियन प्रीमियर लीग ख़त्म हो चुकी है और इससे पहले कि आप इस टूर्नामेंट में खिलाड़ियों के अच्छे या बुरे प्रदर्शन का लेखा-जोखा करें, टी-20 विश्व कप की चर्चा शुरू हो गई है. लगभग एक हफ्ते बाद शुरू हो रहा ये टूर्नामेंट एक बार फिर हमें टेलीविजन के सामने से हिलने नहीं देगा.

आईपीएल 30 से अधिक दिन तक चला. बॉलीवुड मसाले का तड़का लगे इस चकाचौंध भरे टूर्नामेंट का जिन लोगों ने लुत्फ उठाया, उन्हें टेलीविज़न के सामने फिर से अपना आसन जमाने के लिए फिर से रीचार्ज होने की ज़रूरत होगी और ये कोई आसान काम नहीं है, ख़ासकर तब जब अब आपको सिर्फ़ क्रिकेट देखना हो और इससे मनोरंजन का बड़ा हिस्सा गायब हो.

आईपीएल में कई चीज़ें थी जो बहुत अच्छी थी. खेल की क्वालिटी तो अव्वल दर्ज़े की थी ही, दुनिया के दिग्गज क्रिकेटर एक-दूसरे के सामने थे और इसमें मनोरंजन का ज़ोरदार तड़का लगा था.

लेकिन इस टूर्नामेंट में ऐसा भी कुछ था जिसे इस खेल का असल प्रशंसक हजम नहीं कर सका.

कुछ सवाल

मसलन क्या ये क्रिकेट की बेहतरी के लिए है कि खिलाड़ियों, प्रशासकों, प्रायोजकों, मालिकों, ब्रॉडकास्टरों, कमेंटटेटरों और यहां तक कि चयनकर्ताओं के बीच की दूरी कम से कमतर हो जाए.

 क्या ये सही समय नहीं है जब भारतीय क्रिकेट बोर्ड को आईपीएल को न सिर्फ़ टकटकी लगाकर देखना चाहिए, बल्कि समय रहते इसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लेना चाहिए
 

जब टीम के मालिक खुलेआम खिलाड़ियों के साथ कॉरपोरेट बॉक्स में बैठें, ज़्यादातर कमंट्रेटर आयोजकों के वेतनभोगी कर्मचारी हों और यहां तक कि भारत के मुख्य चयनकर्ता किसी टीम के जनसंपर्क का काम देख रहे हों, क्या ऐसे में बाहरी दबाव और निहित स्वार्थों के बग़ैर मैदान में खेलना ख़तरनाक़ या संवेदनशील नहीं होगा.

क्या ये सही समय नहीं है जब भारतीय क्रिकेट बोर्ड को आईपीएल को न सिर्फ़ टकटकी लगाकर देखना चाहिए, बल्कि समय रहते इसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लेना चाहिए.

आईपीएल में जितना पैसा झोंका गया है वो दिमाग को हिलाकर रखने वाला है. मोटा अनुमान है कि सिर्फ़ इसी साल टूर्नामेंट पर कोई 2,000 करोड़ रुपए खर्च हुए.

क्रिकेट बोर्ड के अलावा खिलाड़ी या किसी और के हिस्से में कितनी रकम आई या नहीं ये तो तभी पता चल सकेगा, जब ईमानदारी से इस टूर्नामेंट की बैलेंसशीट बनाई जाए, लेकिन ये वो मुद्दा नहीं है जो इस वक़्त मेरे लिए बहुत मायने रखना हो.

बहुत समय नहीं हुआ जब अख़बार में कॉलम लिखने के मुद्दे पर दिलीप वेंगसरकर की मुख्य चयनकर्ता की कुर्सी पर बन आई थी, लेकिन श्रीकांत की भूमिका को लेकर चूं तक नहीं हुई और कोई शक नहीं कि ये सब देखकर वेंगसरकर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे.

श्रीकांत आईपीएल में चेन्नई किंग्स की जनसंपर्क टीम का हिस्सा थे.
हैरत की बात ये है कि श्रीकांत की दोहरी भूमिका को लेकर सिर्फ़ एक अख़बार को छोड़कर किसी ने आवाज़ नहीं उठाई. तो क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि क्रिकेट बोर्ड के सचिव ही चेन्नई किंग्स के मालिक हैं और अगर जज ही खुद गुनाह में शामिल हो तो कार्रवाई कौन करेगा.

आईपीएल को लेकर वेंगसरकर ने भी कुछेक वाजिब सवाल उठाए हैं. उन्होंने टूर्नामेंट की अवधि और कार्यक्रम को लेकर सवाल उठाए हैं.

टी-20 वर्ल्ड कप में अगर भारतीय टीम शारीरिक और मानसिक थकान से उबरकर उम्मीदों पर खरी उतरती है और खिताब बचाने में कामयाब रहती है तो इसका सेहरा पूरी तरह से खिलाड़ियों की फिटनेस और उनकी मानसिक मज़बूती को जाएगा.

लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो हार की ठीकरा आप सिर्फ़ उनके ही सर नहीं फोड़ सकते.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

 
 
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