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रविवार, 23 नवंबर, 2008 को 12:17 GMT तक के समाचार

प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार

टकराव के रास्ते पर धोनी!

परंपरावादियों को शायद मौजूदा विवाद पर हँसी आए, लेकिन उस रिपोर्टर पर तो ईर्ष्या हो सकती है जिसे यह समचार मिला और लोग जानना चाहते हैं कि सच्चाई क्या है.

सच्चाई उस ख़बर की, जिसमें कहा गया था कि आरपी सिंह को टीम से बाहर किए जाने से नाराज़ कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने इस्तीफ़े की पेशकश की है.

अब चयन समिति की बैठक में क्या हुआ, इस पर भले ही अलग-अलग मत हो सकते हैं. लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी ख़बर लीक किए जाने को लेकर कप्तान धोनी ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी, उससे तो यही लगता है कि वे कई मुद्दे को लेकर टकराव मोल रहे हैं.

ख़राब और असभ्य जैसे शब्दों का इस्तेमाल कप्तान नहीं करते, ख़ासकर भारत में. और बात उस समय और भी गंभीर हो जाती है, जब इन शब्दों का निशाना वे लोग हो जो प्रबंधन में बैठे हों.

लेकिन ऐसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके धोनी ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें हल्के-फुल्के में नहीं लिया जा सकता है.

शंका

धोनी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे भरोसे वाले व्यक्ति हैं और खिलाड़ियों के लिए खड़े होने की उनकी भावना को लेकर कोई शंका नहीं जता सकता.

और इसकी राह में अगर उनकी कप्तानी आती है और चयन समिति की बैठक में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता है तो वे कप्तानी भी दाँव पर लगा सकते हैं.

इससे यह भी साबित हो जाता है कि धोनी किस मिट्टी के बने हैं. रविवार को संवाददाता सम्मेलन में धोनी ने कप्तानी छोड़ने की पेशकश वाली ख़बर से इनकार नहीं किया, कुछ लोग ये भी कह सकते हैं कि उन्होंने इस ख़बर की पुष्टि भी नहीं की.

प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ख़बर लीक किए जाने को लेकर धोनी का ग़ुस्सा ये तो साबित कर ही रहा था कि इस ख़बर में कुछ तो सच्चाई है ही.

धोनी की नाराज़गी ये भी बताती है कि वे टीम भावना की कितनी कद्र करते हैं और वे यह भी नहीं चाहते कि कोई खिलाड़ी ये महसूस करे कि वो टीम के लिए ज़रूरी नहीं है.

कम शब्दों में कहें तो किसी भी ऐसे नेता की तरह जो दूसरों की परवाह करते हैं, धोनी नहीं चाहते कि ये संकेत जाए कि वे अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को मौक़ा दे रहे हैं.

ये बात को समझ में आती है कि जब 15 खिलाड़ियों का चयन करना होता है तो इस पर गंभीर बहस होती है. कई बार किसी एक नाम पर बहस कटु भी हो जाती है.

ऐसा पहले भी हो चुका है और आगे भी होता रहेगा. लेकिन शायद ये पहली बार हुआ है जब किसी कप्तान ने कप्तान ने यह कहते हुए कप्तानी छोड़ने की धमकी दी हो कि उसे वो खिलाड़ी मिलना चाहिए, जो वो चाहता है.

कुछ लोगों को इस पर आश्चर्य हो सकता है कि कोई कप्तान ऐसा क्यों करना चाहेगा, वो भी एक ऐसे खिलाड़ी को लेकर, जिसका कोई बहुत अच्छा रिकॉर्ड नहीं रहा है और न ही वो खिलाड़ी हमेशा 11 खिलाड़ियों में जगह ही पाता है.

इस तर्क में थोड़ा-बहुत दम हो सकता है लेकिन इस मामले में मुद्दा ये नहीं है. दरअसल इस मुद्दे पर पहले भी काफ़ी बहस हो चुकी है और ये मुद्दा है चयन के मामले में कप्तानों को कितना दखल होना चाहिए.

फ़ैसला

हममें से ज़्यादा लोग यही तर्क देंगे कि निर्णायक फ़ैसला कप्तान का ही होना चाहिए ख़ासकर उस स्थिति में जब दो खिलाड़ियों में से किसी को चुनना हो.

आख़िरकार कप्तान ही तो ये बात सबसे अच्छी तरह जानता है कि उसे किस माहौल में मैच खेलना है और उसे वही खिलाड़ी मिलने चाहिए, जो वो चाहता है.

इसलिए पसंदीदा खिलाड़ी न मिलने पर धोनी का ग़ुस्सा समझ में आता है. धोनी को आपत्ति उठाने का पूरा अधिकार है. और अगर वो इस मामले को इतना गंभीर है तो कप्तानी छोड़ने की धमकी भी समझ में आती है.

ऐसे उकसावे वाले बयानों का हमेशा ये मतलब नहीं होता कि जो इरादा ज़ाहिर किया जा रहा है, वैसा कर ही दिया जाए. लेकिन इससे ये ज़रूर दिखता है कि धोनी अपनी तरह के व्यक्ति हैं और ये भी हो सकता है कि व्यवस्था के साथ उनके ख़राब रिश्ते की ये सिर्फ़ शुरुआत हो.

ये दुनिया अपनी व्यवस्था के भीतर किसी 'विद्रोही' को पसंद नहीं करती. ज़्यादा बोलने की क़ीमत पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली को भी चुकानी पड़ी थी.

इस समय महेंद्र सिंह धोनी भारत के पसंदीदा खिलाड़ी हैं. ख़तरे की घंटी के बावजूद प्रबंधन धोनी से टकराव लेने से पहले इस मामले से सावधानी पूर्वक निपटना चाहेगा.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)