शनिवार, 15 नवंबर, 2008 को 13:01 GMT तक के समाचार
प्रदीप मैगज़ीन
वरिष्ठ खेल पत्रकार
राजकोट वनडे मैच में युवराज सिंह को इंग्लैंड के आक्रमण की धज्जियाँ उड़ाते देखकर लोगों की साँसें थम सी गई थी.
उनके शानदार स्ट्रोक्स का सिलसिला देखकर आप इस पर ज़रूर चकित हो रहे होंगे कि युवराज क्रिकेट के बड़े खिलाड़ियों में शुमार क्यों नहीं हैं?
युवराज टेस्ट क्रिकेट में नाकाम क्यों हैं? क्या ढीले-ढाले तकनीक की भी एक सीमा है और ऐसी तकनीक की टेस्ट क्रिकेट में पोल खुल जाती है या फिर उनके व्यक्तित्व में कुछ कमी है, जिसके कारण वे टेस्ट क्रिकेट में अपना जलवा नहीं दिखा पाते.
ये आसान सवाल नहीं है, जिनका जवाब दिया जा सके. एक बल्लेबाज़ की कमियाँ उस समय ज़्यादा बड़ी दिखने लगती हैं जब वह या तो रन बनाने में नाकाम हो जाता है या संघर्ष करने लगता है.
युवराज सिंह के बारे में कहा जाता है उनका बैक लिफ़्ट बहुत ऊँचा है यानी स्ट्रोक्स लगाने से पहले वे अपने बल्ले को काफ़ी पीछे ले जाते है. ऐसा लगता है मानों थर्ड मैन की दिशा से उनका बल्ला नीचे आता है.
उनका फ़ॉलो-थ्रू यानी शॉट लगाने के बाद की स्थिति में भी बल्ला काफ़ी ऊपर जाता है. इस कारण तेज़ उछाल लेती गेंदों या फिर घूमती गेंदों पर खेलना उनके लिए मुश्किल होता है.
लेकिन जब इसी बैक लिफ़्ट और फ़ॉलो-थ्रू की मदद से युवराज लगातार बेहतरीन शॉट्स लगाते हैं, तो यही उनकी मज़बूती हो जाती है.
रिचर्ड्स से तुलना?
पिछले साल ट्वेन्टी-20 विश्व कप में युवराज सिंह ने एक ओवर में लगातार छह छक्के मारे थे, तो उनकी तुलना महान सर गैरी सोबर्स से की जाने लगी थी.
हमने सोबर्स की बल्लेबाज़ी नहीं देखी है. लेकिन जो कुछ मैंने सुना और पढ़ा है, उसके मुताबिक़ सोबर्स किसी भी लंबाई की गेंद को मनपसंद दिशा में मार सकते थे और ऐसा करते समय उनका पैर घूमता तक नहीं था.
सोबर्स ऐसा किसी भी आक्रमण के ख़िलाफ़ कर सकते थे. सोबर्स की एक ख़ासियत ये भी थी कि वे ऐसा अक्सर करते थे.
हमारे समय में जिस बल्लेबाज़ ने गेंदबाज़ों की जम पर धुनाई की, वो थे विवियन रिचर्ड्स. विवियन रिचर्ड्स भले ही रन बनाने और शतक लगाने में ब्रायन लारा और सचिन तेंदुलकर जैसे न हो, लेकिन उन गेंदबाज़ों से पूछिए जिन्होंने रिचर्ड्स के ख़िलाफ़ गेंदबाज़ी की हो.
ये गेंदबाज़ आपको बताएँगे कि वे रिचर्ड्स को गेंद फेंकने में सबसे ज़्यादा क्यों डरते थे. मैं नहीं समझता कि बेहतरीन और प्रवीण गेंदबाज़ों की धज्जियाँ उड़ाने वाला रिचर्ड्स जैसा कोई बल्लेबाज़ रहा है.
कठिन विकेट पर भी रिचर्ड्स ने जिस तरह के स्ट्रोक्स लगाए हैं, जो ज़्यादातर बल्लेबाज़ सपने में ही सोच सकते हैं.
राजकोट में जिस तरह युवराज ने बल्लेबाज़ी की, उसके कारण उनकी रिचर्ड्स से तुलना शायद ग़लत नहीं कही जा सकती. युवराज जिस अकड़ के साथ गेंदबाज़ों की दुर्गति करते हैं, वह रिचर्ड्स जैसा ही है.
लेकिन दोनों में जो बड़ा अंतर है, वो है रिचर्ड्स का किसी भी परिस्थिति में राजकोट जैसा प्रदर्शन करना. रिचर्ड्स ख़राब से ख़राब परिस्थिति में ऐसा कर सकते थे और न सिर्फ़ वनडे में बल्कि टेस्ट में उनका बल्ला इसी तरह चलता था.
कठिनाई
युवराज के साथ सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि वे लगातार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते. टेस्ट क्रिकेट में उनकी नाकामी किसी के लिए भी इतनी पीड़ादायक है कि वो उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में शुमार नहीं करता.
अगर किसी को युवराज की याद में कुछ लिखना हो तो वह उन्हें ऐसे बल्लेबाज़ के रूप में याद करेगा, जो किसी भी आक्रमण की धज्जियाँ उड़ा सकता है लेकिन जब स्थिति बल्लेबाज़ी के अनुकूल हो.
युवराज को जो चीज़ें सबसे ज़्यादा परेशान करती होंगी, वो ये है कि भारतीय क्रिकेट के परिदृश्य पर धोनी के आने से पहले वे एक तरह से भविष्य के कप्तान चुन लिए गए थे.
अब युवराज 26 साल के हो चुके हैं और स्थिति ये है कि टीम की उप कप्तानी भी उनसे छीन ली गई है. भारतीय टीम के पूर्व कोच जॉन राइट युवराज को भारतीय टीम का रॉक स्टार कहते थे.
मैदान के बाहर उनकी इसी छवि को ज़्यादा प्रचार मिला. राजकोट में युवराज की विस्फोटक पारी इसकी याद दिलाती है कि युवराज के पास कितनी प्रतिभा है.
युवराज के लिए अभी देर नहीं हुई है. युवराज को चाहिए कि वे उन अवरोधों को दूर करें, जिनके कारण उनकी सीमा एक बल्लेबाज़ तक सीमित होकर रह गई थी.
लेकिन होना ये चाहिए था कि वे वनडे हो या टेस्ट, गेंदबाज़ों के लिए दुस्वप्न बनते. जिनके कारण गेंदबाज़ों की नींद उड़ जाती. इतंज़ार तो बस इसका है.
(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)