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अभिनव बिंद्रा के साथ एक मुलाक़ात
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बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत
कराते हैं.
इस हफ्ते हमारे मेहमान हैं, बीजिंग ओलंपिक में इतिहास रचने वाले निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा. बिंद्रा ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले इकलौते भारतीय हैं.
ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर ज़ोरदार स्वदेश वापसी पर आपको कैसा लग रहा है? मैं इन सबका लुत्फ उठाने की कोशिश कर रहा हूँ. हालाँकि अभी इसमें सफल नहीं रहा हूँ. सही कहूँ तो जश्न का दौर खत्म होने का इंतज़ार कर रहा हूँ. अच्छा अगर आपका प्यारा सा दोस्त होता तो वह आपके लिए क्या करता कि आप इन सबका लुत्फ उठाते? वो मुझे यहाँ से बाहर ले जाता. हम कहीं छुट्टियां बिताते और मजे करते. मुझे इसमें बहुत खुशी मिलती. कौन सी जगह छुट्टियां बिताने का मन कर रहा है? दरअसल, अभी इन सबके बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला है. मेरे पास कुछ सोचने का समय ही नहीं है और सोचने की ऊर्जा भी फिलहाल नहीं बची है. अच्छा गोल्डन फिंगर, गोल्डन ब्वॉय, गोल्डन गन सुनकर कैसा लगता है? ये कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें तो लगती ही हैं, लेकिन बात अजीब है. मैं तो पहले जैसा ही हूँ. कोई सोने का आदमी तो बन नहीं गया हूँ. ये किसी सपने जैसा लग रहा है क्या? मैं पिछले 12 साल से मेहनत कर रहा हूँ. और मेरा उद्देश्य कभी प्रचार, लोकप्रियता हासिल करना नहीं रहा. इन सब चीजों ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया. मैं हमेशा से देश के लिए कुछ करना चाहता था. मेरा लक्ष्य ओलंपिक में स्वर्ण पदक हासिल करना था और मैंने वही किया. आपने एक इंटरव्यू में कहा कि निशानेबाज़ निहायत अकेला होता है. रोज शूटिंग रेंज में जाकर अकेले अभ्यास करना. असलियत क्या है? देखिए, निशानेबाज़ी ऐसा खेल है, जिसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. हर रोज नई चुनौती होती है. हर दिन नया दिन होता है. आप एक समस्या सुलझाते हो तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है. दरअसल, यही वजह है कि मैं इसकी तरफ आकर्षित हुआ.
और रोज़ नई चुनौती का सामना करते थे तो भी अकेलापन महसूस करते थे? पहले तो लगता था कि मैं कर क्या रहा हूँ. लेकिन कुछ समय बाद मुझे इसमें मज़ा आने लगा. मैं चुनौतियों का सामना करता रहा. मुश्किलों के लिए मैं तैयार रहने लगा. आपके स्वर्ण पदक को छोड़ दिया जाए तो बीजिंग ओलंपिक का अनुभव कैसा रहा? ये मेरा तीसरा ओलंपिक था. सिडनी में पहले ओलंपिक में मैंने पूरा मज़ा लिया. मैं ओलंपिक दल का सदस्य बनकर ही बहुत खुश था. एथेंस में मैं जीतना चाहता था. मैं पदक जीतने के बहुत करीब था, लेकिन बदकिस्मती से चूक गया. फिर मैंने एक कोशिश और की. इस बार बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर नहीं गया था. मैं वहाँ ये सोचकर नहीं गया था कि स्वर्ण पदक जीतूँगा. मैं अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के इरादे से वहाँ गया था. मैंने वहाँ सिर्फ बीजिंग एयरपोर्ट, ओलंपिक विलेज और शूटिंग रेंज ही देखे. वैसे भी एथलीट का जीवन बहुत 'ग्लैमरस' लगता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. उसकी दिनचर्या बहुत मुश्किल होती है. उसे कड़ी प्रतिस्पर्धा से जूझना होता है. जब आपको स्वर्ण पदक मिला और आप विजय मंच पर थे, जब राष्ट्रीय धुन बजी तो आपको देखकर ऐसा लग रहा था कि आपको तो रोज़ ही स्वर्ण पदक मिलता है? देखिए मैंने पहले ही कहा कि मैं ओलंपिक में बिना किसी उम्मीद के गया था. मुझे जीत-हार का डर नहीं था. मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहता था. किस्मत से ये मेरा दिन था. वैसे भी मैं सीधा-सादा इंसान हूँ. नाटकीयता मुझे पसंद नहीं है. मैं वैसा नहीं हूँ कि जीत मिली तो बस कूदने लगे. मुझे पता है कि जीत और हार में ज़्यादा फर्क नहीं होता. उस ख़ास दिन आपका प्रदर्शन मायने रखता है, हर माँ-बाप अपने बच्चे को ये बातें सिखाना चाहेंगे. आप क्या कहते हैं?
यही सच्चाई है. कोई शॉर्टकट नहीं है. अगर कोई शॉर्टकट होता तो मैं वही अपनाता. स्वर्ण पदक जीतने के बाद आपने कहा कि आप खुद को सातवें आसमान पर महसूस कर रहे हैं. क्या ये भी सोच समझकर कहा था? देखिए, 2006 में मैंने विश्व चैंपियनशिप जीती. मेरा मानना है कि ये चैंपियनशिप ओलंपिक से ज़्यादा मुश्किल होती है. जब आप चोटी पर होते हैं तो उसके बाद क्या है. आपको वापस लौटना ही होता है. ये ठीक वैसा ही है कि आप अगर अचानक अरबपति हो जाएं तो आखिर कितने दिन इसका लुत्फ उठाएँगे. कुछ दिनों में बोर हो जाँएगे. मैं जब विजय मंच पर था तो मुझे भी गर्व की अनुभूति हो रही थी. ये सपने के सच होने जैसा था. मैंने इसके लिए बहुत इंतज़ार किया था. मैं बहुत खुश था. फिर सब सामान्य हो गया. जैसे ही वो गोली चली जिसने स्वर्ण पदक पक्का किया तो सबसे पहले क्या ख़्याल आया? वो बहुत गौरवशाली क्षण था. लेकिन कुछ ख़ास ख़्याल नहीं आया. मुझे नहीं पता था कि देश में इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी. मुझे खुशी है कि लोगों को गौरवान्वित करने और उन्हें खुशी देने में कुछ योगदान कर सका. हमें ओलंपिक में तीन पदक मिले हैं. लेकिन ये कहा जा रहा है कि व्यक्तिगत उपलब्धि ज़्यादा है सिस्टम की उपलब्धि नहीं. तो सिस्टम को सुधारने का कुछ फार्मूला या रामबाण है? नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं है. बेशक हमने ओलंपिक में तीन स्वर्ण पदक जीते हैं, लेकिन खेलों को संचालित करने वालों की ज़िम्मेदारी बढ़ गई है. मैं ये भी मानता हूँ कि खिलाड़ियों को भी जमकर मेहनत करनी होगी, लेकिन खिलाड़ियों को सफल होने के अवसर मुहैया कराए जाने चाहिए. इसका कोई तुरंत इलाज नहीं है. अगर हम अभी शुरू करेंगे तो शायद 10 साल बाद हमें नतीजे देखने को मिलेंगे. क्या आपको लगता है कि ऐसा होगा, सिस्टम सुधरेगा? सबसे बड़ी बात है कि खेलों के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ी है. मेरा मानना है कि कॉरपोरेट को भी आगे आना चाहिए. क्रिकेट के अलावा उन्हें ओलंपिक खेलों को अपनाना चाहिए. खेलों का आधारभूत ढाँचा सुधारने में मदद करनी चाहिए. ऐसे कदम उठाने से ही खेलों का भला होगा.
जब भारत ने तीन मेडल जीते तो कुछ खेल पंडितों ने कहा कि क्रिकेट का बुखार कम होगा और दूसरे खेलों की पूछ बढ़ेगी. आपको ऐसा लगता है? नहीं, मुझे इसमें शक है. मुझे लगता है कि मीडिया की भी कुछ ज़िम्मेदारी बनती है. टीवी चैनल देखो तो क्रिकेट ही क्रिकेट. न्यूज़ चैनल देखिए तो भी क्रिकेट. मुझे क्रिकेट दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मेरा मानना है कि पूरे दिन में कम से कम 10 मिनट तो दूसरे खेलों को दिखाइए. आपको भी क्रिकेट पसंद है? हाँ मुझे भी क्रिकेट पसंद है. टेलीविजन पर ये अच्छा टाइमपास है. आपका पसंदीदा क्रिकेटर? सचिन तेंदुलकर हमेशा से ही मेरे पसंदीदा क्रिकेटर रहे हैं. कैसा लगता है जब कुछ लोग कहते हैं कि सचिन चूकने लगे हैं? हमें इस बात की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने 20 साल में क्या-क्या हासिल किया है. हमारी उम्मीदें तो बढ़ती जाती हैं, हर किसी की उम्मीद पर खरा नहीं उतरा जा सकता. आपके शहर से भी एक क्रिकेटर हैं युवराज सिंह? हाँ, लेकिन मैं उनसे कभी नहीं मिला. ट्वंटी-20 में मुझे उनके एक ही ओवर में 6 छक्के बहुत पसंद आए. अच्छा कुछ बातें आपके बचपन की करते हैं. आप बचपन में कैसे थे? मेरी एक बड़ी बहन है. बचपन में मैं आम बच्चों जैसा ही था. जब मैं बच्चा था तो मुझे कोई खेल पसंद नहीं था, लेकिन जब से मैंने शूटिंग शुरू की, पढ़ाई छूट गई. ये सच है कि जब तक मैंने निशानेबाज़ी शुरू नहीं की थी तब तक कोई खेल नहीं खेला था. और निशानेबाज़ी एकदम से कैसे शुरू की? मुझे परिवार के एक मित्र ने चंडीगढ़ में निशानेबाज़ी कोच से मिलवाया. मुझे ये खेल बहुत पसंद आया और फिर सिलसिला शुरू हो गया. ये पहली नज़र में प्यार जैसा था. निशानेबाज़ी के अलावा किसी और चीज़ से प्यार? नहीं, बिल्कुल नहीं. मैंने पिछले 12 साल में खाने, पीने, सोने और निशानेबाज़ी के अलावा कुछ नहीं किया है. निशानेबाज़ी के अलावा जीवन में बहुत सी बातें हैं, लेकिन मैंने कुछ नहीं किया. अंग्रेज़ी में ‘आई एम ऐ लूज़र.’
और दोस्त, डांस, पार्टियां? मैं कभी डिस्को नहीं गया. वैसे भी ऐसी पार्टियों में जाने से क्या फायदा कि जहाँ सब आपको देख रहे हों और आप पार्टी का मज़ा नहीं ले पाते. ये बहुत मुश्किल है. आपके माता-पिता ने आपको बहुत सहयोग दिया. पढ़ाई-लिखाई पर ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. सुनने-पढ़ने में ये बहुत अच्छा लगता है. क्या वाकई ऐसा है? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. पढ़ाई को लेकर मां मुझे हमेशा टोकती रहती थी. मेरा मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था. लेकिन मेरे पिता खेलों को लेकर मेरा बहुत सहयोग करते थे. पैसे के लिहाज़ से मुझे घरवालों का पूरा समर्थन तो था ही लेकिन एक नैतिक रूप से भी मुझे घर वालों ने काफ़ी सहयोग दिया. बुरे दिनों में आपका अनुभव कैसा रहा? वाकई, वो दौर खुद को आंकने का सबसे सही समय होता था. बहुत निराशा होती थी. कुछ भी अच्छा नहीं होता था. बहुत कोशिशों के बाद भी अच्छा प्रदर्शन नहीं होता था. लेकिन कुछ समय के बाद आप इसके आदी हो जाते हैं. आप जान जाते हैं कि इनसे कैसे निकलना है. मैंने फिर जीत-हार को बहुत गंभीरता से नहीं लिया. मेरे लिए बहुत ज़रूरी था कि खुद को अच्छे प्रदर्शन के लिए तैयार करूँ. मायने ये रखता है कि आप अपने प्रदर्शन से कितना संतुष्ट हैं. ऐसी बातें तो सभी करते हैं, लेकिन आपके मुँह से अच्छी लग रही हैं? मैं चीजों को हल्के में लेता हूँ. मेरे लिए यही अहम है कि जीत-हार को बहुत महत्व न दूँ. क्रिकेट के अलावा और क्या देखना पसंद हैं? टेनिस और दूसरे खेल भी पसंद हैं. रोजर फेडरर अच्छे खिलाड़ी हैं. उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है. अभी राफेल नडाल उन्हें टक्कर दे रहे हैं, लेकिन ये लगा रहता है. कोई भी हर समय चोटी पर बना नहीं रह सकता. एथेंस ओलंपिक में मैं उनसे मिला था.
फ़िल्में पसंद हैं? बॉलीवुड और हॉलीवुड दोनों फ़िल्में पसंद हैं. पिछले दो-तीन महीने से तो कोई फ़िल्म नहीं देखी. लेकिन मैंने ओम शांति ओम, जब वी मेट देखी. मुझे जब वी मेट काफ़ी पसंद आई. खुद को किस फ़िल्मी किरदार के क़रीब पाते हैं? मुझे नहीं पता. मैं करीना कपूर का प्रशंसक हूँ, लेकिन खुद की तुलना किसी से नहीं कर सकता. अगर आपको किसी फ़िल्म में अभिनय का मौका मिले तो कौन सा किरदार निभाना चाहेंगे? नहीं, मैं कभी फ़िल्म नहीं कर सकता. मेरे अंदर इतना आत्मविश्वास नहीं है कि फ़िल्मों में अभिनय कर सकूँ. आपका पसंदीदा खाना? फिलहाल तो घर का खाना ही पसंद है. क्योंकि लंबे समय से होटल का खाना खा रहा हूँ. घर की चिकन-रोटी बहुत पसंद है. आपकी पसंदीदा घूमने की जगह? अभी तो घर में ही रहने का मन कर रहा है. पिछले 12 साल में मैं लगभग पूरी दुनिया घूमा हूँगा, लेकिन जैसा मैंने आपको बताया सिर्फ तीन चीजें ही मैंने देखी. एयरपोर्ट, होटल और शूटिंग रेंज. अगले कुछ सालों में निशानेबाज़ी के अलावा दूसरी चीजें कैसे हासिल करेंगे? बेशक, ये मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा. क्योंकि मैंने अब तक निशानेबाज़ी के अलावा कुछ किया ही नहीं है. ये बहुत चुनौतीपूर्ण है. मुझे हर चीज़ शुरुआत से करनी होगी और मेरे लिए हर बात नई होगी. तो क्या अभिनव बिंद्रा की गर्ल फ्रेंड नहीं है? मेरे बहुत सारे दोस्त हैं और कई क़रीबी मित्र, लेकिन कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है. अपने बारे में दो लाइनें कैसे लिखेंगे? मैं दृढ़ मानसिकता वाला इनसान हूँ. मैं जल्दी नहीं घबराता. मुश्किलों का सामना कर सकता हूँ. |
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