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मंगलवार, 10 अगस्त, 2004 को 07:13 GMT तक के समाचार
 
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जब गाँधी जी ने पूछा, ये हॉकी क्या है?
 
भारत की दावेदारी ओलंपिक में कभी भी बहुत ज़्यादा मज़बूत नहीं रही है. इसके बावजूद भारत की हिस्सेदारी के बारे में ढेरों ऐसे तथ्य हैं जो सामने नहीं आए हैं और जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. ऐसी ही कुछ जानी-अनजानी घटनाओं का ब्यौरा....

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जब गाँधी जी ने पूछा- हॉकी क्या है

महात्मा गाँधी उन दिनों इरविन से बातचीत में व्यस्त थे

1932 के ओलंपिक में हिस्सा लेने के लिए भारतीय टीम के पास पैसे नहीं थे. लोगों ने सलाह दी कि अगर गाँधी जी जनता से अपील करें तो पैसों का इंतज़ाम हो जाएगा. लेकिन गाँधी जी उन दिनों शिमला में थे. लॉर्ड इरविन से उनकी बातचीत चल रही थी. एक पत्रकार चार्ल्स न्यूहम को गाँधी जी से बातचीत करने का ज़िम्मा दिया गया था. जब न्यूहम ने गाँधी जी को इस स्थिति के बारे में अवगत कराया तो उनका पहला सवाल था- यह हॉकी क्या है? बस मिशन नाकाम हो गया. शायद उन दिनों गाँधी जी के दिमाग़ में देश की आज़ादी के लिए संघर्ष के सिवा कुछ भी नहीं था.

(स्रोत- मेजर ध्यानचंद की जीवनी द गोल से साभार)

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भारत ने दो रजत भी जीते हैं

आधिकारिक तौर पर भारत ने एंटवर्प ओलंपिक से ही खेलों के इस महाकुंभ में हिस्सा लेना शुरू किया था और अगर हॉकी को छोड़ दें तो पिछले 80 साल में पदक के लिए तरसता ही रहा है. व्यक्तिगत मुक़ाबलों में भारत को अब तक तीन काँस्य पदक (केडी जाधव, लिएंडर पेस और कर्णम मल्लेश्वरी) को ही मिल पाए हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत को ओलंपिक मुक़ाबलों में दो रजत पदक भी मिल चुके हैं. 1900 के पेरिस ओलंपिक में कोलकाता के एक एंग्लो-इंडियन नॉर्मन प्रीचार्ड ने यह कारनामा किया था. उन्होंने 100 मीटर, 200 मीटर, 100 मीटर बाधा दौड़ और 200 मीटर बाधा दौड़ में हिस्सा लिया था. 200 मीटर और 200 मीटर बाधा दौड़ में वे रजत पदक जीतने में सफल रहे थे.

(स्रोत-आधिकारिक, वेबसाइट पर मौजूद)

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दिल्ली में हारी टीम ने जीता पदक

फ़ाइनल में जर्मनी को हरा कर स्वर्ण पदक जीता टीम ने

1936 में एक बार फिर हॉकी टीम ओलंपिक की तैयारी में थी. टीम के बर्लिन रवाना होने से पहले 16 जून 1936 को दिल्ली के मोरी गेट स्टेडियम में ओलंपिक जाने वाली टीम व दिल्ली एकादश के बीच एक अभ्यास मैच खेला गया था. दिल्ली एकादश ने यह मैच चार गोल से जीत लिया. लोगों ने कहा जो टीम यहाँ हार गई, वह ओलंपिक में जाकर क्या करेगी. लेकिन उसी टीम ने 15 अगस्त 1936 को जर्मनी को 8-1 से हराकर स्वर्ण पदक जीता.

(स्रोत- द गोल और रेफ़री ज्ञान सिंह की जीवनी से)

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मौक़ा चूक गया भारत

1948 के लंदन ओलंपिक में भारत इतिहास बनाने से चूक गया. ट्रिपल जंप में भारत के हेनरी रेबेलो ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फ़ाइनल में प्रवेश किया. उनके प्रदर्शन को देखते हुए यह तय माना जा रहा था कि वे भारत के लिए पहला व्यक्तिगत पदक जीतेंगे लेकिन दुर्भाग्य ठीक फ़ाइनल के पहले उनकी तबीयत ख़राब हो गई और भारत का सपना टूट गया.

(स्रोत- आधाकारिक, वेबसाइट पर मौजूद)

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नंगे पाँव उतरे दो भारतीय

1948 में भी भारत ने स्वर्ण जीता था

1948 में हॉकी का फ़ाइनल भारत और ब्रिटेन के बीच होना था. लेकिन ऐन मैच के दिन बारिश हो गई. मैदान में फिसलन आ गई. भारत के दो फ़ॉर्वर्ड खिलाड़ियों केडी सिंह बाबू और किशनलाल ने नंगे पाँव मैदान में उतरने का फ़ैसला किया. इन दोनों खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन से भारत ने ग्रेट ब्रिटेन को इस मैच में 4-0 से हराया.

(स्रोत- मेजर ध्यानचंद की जीवनी द गोल से)

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खिलाड़ियों ने किया मैदान साफ़

1952 में एक बार फिर भारत और ग्रेट ब्रिटेन आमने-सामने थे. हॉकी के सेमी फ़ाइनल में बारिश ने इस बार भी ज़ोरदार रंग दिखाया और नतीजा यह हुआ कि पूरा मैदान पानी से भर गया. कुछ ही देर बाद ग्राउंड्स मैन के साथ-साथ भारतीय टीम भी मैदान में उतरी. लेकिन हॉकी खेलने के लिए नहीं बल्कि ग्राउंड में से पानी निकालने के लिए.

(स्रोत- मेजर ध्यानचंद की जीवनी द गोल से)

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एक कप चाय तो पिला दो

बात 1948 के लंदन ओलंपिक से पहले की है. दिल्ली में ट्रायल चल रहा था. एक एथलीट ने 68 मीटर से ज़्यादा चक्का फेंक कर ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई किया. लेकिन बाद में उसे पता चला कि इस इवेंट के लिए भारतीय टीम ही नहीं भेजी जा रही है. इसके बाद उन्हें वापस लौट जाने को कहा गया. उनके वापस अपने घर लौट जाने के कुछ ही दिन बाद उन्हें तार भेजा गया कि वे जल्दी दिल्ली आएँ. दिल्ली में उन्हें बताया गया कि उन्हें ओलंपिक में भाग लेने के लिए लंदन जाना है. आनन-फ़ानन में ड्रेस तैयार हुए और बाक़ी तैयारियाँ हुईं. फिर मुश्किल आई टिकट की.

1948 के लंदन ओलंपिक का नज़ारा

एयर इंडिया ने कहा- आधे पैसे आप दो आधा हम देंगे. इस खिलाड़ी के साथ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त मनोहर सिंह गिल भी थे. गिल साहब के पास भी पैसे नहीं थे. इसलिए उनका पैसा भी उस खिलाड़ी ने भरा. दिल्ली से लंदन पहुँचने के बाद ठहरने की मुश्किल आई. गिल साहब के दोस्त धारीवाल लंदन में रहते थे. ओलंपिक में हिस्सा लेने आए नौ और एथलीट भी इन दो लोगों के साथ हो लिए. धारीवाल जी ने इन 11 लोगों को एक ही कमरे में ठहरा दिया. अगले दिन धारीवाल जी ने खिलाड़ियों को एक रोडमैप पकड़ाया और कहा कि जाओ घूम आओ. खिलाड़ियों ने भी पूरी बेशर्मी से कहा- धारीवाल जी एक कप चाय तो पिला दो. चक्का फेंकने गए वे एथलीट थे प्रवीण कुमार.

(स्रोत- प्रवीण कुमार से बातचीत के आधार पर)

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श्रीराम के कोच बाहर रहे

1976 का माँट्रियल ओलंपिक. मशहूर भारतीय एथलीट श्रीराम सिंह के कोच इलियास बाबर जब उनसे मिलने पहुँचे तो उनकी ड्रेस, बढ़ी दाढ़ी देख कर गार्ड ने उन्हें बाहर ही रोक दिया. बाबर साहब कुर्ता-पायजामा पहनते थे. ऊपर से परेशानी यह थी कि उन्हें न तो अंग्रेज़ी आती थी और न फ़्रेंच. किसी तरह श्रीराम सिंह तक उनके आगमन का संदेश भिजवाया गया. श्रीराम के आने के बाद ही बाबर साहब अंदर जा सके.

(स्रोत- मशहूर कमेंटेटर जसदेव सिंह से बातचीत के आधार पर)

 
 
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