BBC navigation

खेल में कोई रीटेक नहीं होताः सौरभ गांगुली

 शुक्रवार, 27 दिसंबर, 2013 को 13:25 IST तक के समाचार
सौरभ गांगुली

सौरभ, जब आप क्रिकेट में अपने करियर के बारे में पीछे मुड़कर देखते हैं कि तो क्या आपको लगता है कि अगर आप कोई काम किसी और तरीक़े से करते तो अच्छा रहता ?

खेल में उसी पल उसी समय निर्णय लेना होता है और ज़िंदगी में बहुत सारी चीज़ें ऐसी हैं जिसमें आपको उसी वक़्त निर्णय लेना होता है. इसीलिए बाद में पछतावा नहीं करना चाहिए. क्योंकि तब का समय और तब के हालात अलग होते हैं और वो समय अलग होता है जब बाद में आपको सोचने का मौका मिलता है. जो मैं करूँगा अच्छे के लिए करूँगा. जो मैं करूँगा अपने दिल से करूँगा. जो मैं करूँगा उसमें यही चाहूँगा कि भारतीय क्रिकेट टीम जीते. मैं यह भी कहूँगा कि टीवी की तरह खेल में कोई रीटेक नहीं होते. अभी टीवी में काम करते हुए रीटेक मिलते हैं लेकिन जो गेंद खेलनी है वो एक ही बार खेलनी है. आपको कोई नहीं कहेगा कि कोई बात नहीं ग़लती हो गई, फिर दोबारा खेल लो. तो बाद में उसके बारे में कयास लगाना, या उसे सुधारने की बारे में सोचने का कोई फायदा नहीं है.

जब आप नैटवेस्ट सीरीज़ में भारत की जीत के बाद इंग्लैंड के लॉर्ड्स मैदान में अपनी शर्ट उतार के बाद भागे थे तब आपकी कई लोगों ने आलोचना की थी. क्या आपको ऐसा करना चाहिए था?

देखिए लॉर्ड्स का अपना एक इतिहास है जहाँ ऐसा किसी ने नहीं किया. और ऐसा नहीं है कि किसी ने नहीं किया तो आप भी नहीं करेंगे. हमने वहाँ जीत के इतिहास बनाया था. शर्ट उतारना अलग बात है. लेकिन उस दिन भारत जीता था. मेरे लिए वो इतिहास था. मेरे लिए वो बहुत ख़ुशी का दिन था. ख़ुशी उस तरह से ज़ाहिर हुई. उस दिन जोश में, ख़ुशी में जो हो गया वो हो गया. लेकिन आगे ऐसा नहीं करूंगा. चाहे कितनी भी ख़ुशी हो उसे अलग ढंग से ज़ाहिर करेंगे. क्योंकि एक तो सलमान ख़ान की बॉडी नहीं है. दूसरी बात ये कि मैं ऐसा इंसान नहीं हूँ. मैं ठंडे मिजाज़ का इंसान हूँ. लेकिन उस दिन जोश में, ख़ुशी में वो हरकत हो गई.

आप पहले भी यह कह चुके हैं कि निजी ज़िंदगी में आप शांत हैं लेकिन आप खेलते हुए धारदार इंसान हैं ?

मैं बहुत शांत इंसान हूँ. चिल्लाता भी नहीं हूँ. घर पर चिल्लाने को मिलता भी नहीं है. घर पर चिल्लाने को माँ और बीवी ही काफी हैं. अभी वो लोग जब बाद में यह सुनेंगे तो चिल्लाएंगे. मेरी ज्यादा चाहत नहीं है. मैं शांति से ज़िंदगी गुज़ारता हूँ. मैं चाहता हूँ कि बस काम में लगे रहें. बेटी साना को बड़ा करें. उससे जितनी ख़ुशी मिलती है, उतनी और किसी चीज़ से नहीं मिलती. भगवान ने ज़िंदगी बहुत अच्छी दी है. ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्र है. जब हम बाहर दूसरों को देखते हैं और खुद की ज़िंदगी देखते हैं तो पता चलता है भगवान ने कितनी मेहरबानी की है. भारत के लिए क्रिकेट खेलने की भी ख़ुशी है. ज़िंदगी में कोई परेशानी नहीं है.

"मैं मानता हूँ कि खेल जीतने के लिए खेलते हैं. और शायद इसी जीतने की उम्मीद से आक्रामकता आती है"

जब आप बैट लेकर, पैर में पैड बांधकर मैदान में आते थे तब उस सौरभ गांगुली को पीछे छोड़ देते थे जो बहुत ही नम्रता से बात करता है. वो आक्रामकता आप कहाँ से लाते थे? क्या सोचते थे?

अच्छा खेलने की इच्छा से यह होता है. यह मैंने महसूस किया था कि जब हम दिल से खेलते हैं तब हम सफल होते हैं. मैं हमेशा मानता हूँ कि हम क्रिकेट खेलते हैं जीतने के लिए. मराठी में इसे कहते हैं खड़ूस क्रिकेट. खुन्नस में खेलना. आप लोग कई बार लिखते हैं कि केवल खेल में शामिल होना ही काफी है. मैं इस चीज़ को मानता ही नहीं हूँ. जीतने के लिए खेलते हैं. और शायद इसी जीतने की उम्मीद से आक्रामकता आती है.

जब आपको हिंदुस्तान की टीम का कैप्टन बनाया गया था. तब टीम अच्छे समय से नहीं गुज़र रही थी. लेकिन आपने क्रिकेट टीम को जीत के तेवर दिए. आपने ये कैसे किया?

क्रिकेट एक इंसान का खेल नहीं है. यह टीम का खेल है. जीतने के लिए इसमें सभी खिलाड़ी बहुत अच्छे होने चाहिए. ये टैनिस या गॉल्फ़ नहीं है जहाँ ख़ुद अच्छे हुए तो जीत गए. मैं हमेशा मानता था कि क्रिकेट की ग्यारह लोगों की टीम में सही खिलाड़ी का चयन करना सबसे ज़रूरी है. उसके बाद उन्हें खेलने के लिई समय देना ज़रूरी है. जब मैं छोटा था, तब मैंने क्रिकेट में शुरुआत की थी तो लोगों की अपेक्षाओं का बहुत दबाव रहता था. तो मैं यही सोचता था कि जो भी नया खिलाड़ी आए उसके लिए ऐसा माहौल बनाया जाए कि उसे सभी तरह के दबाव से बाहर निकाला जाए. तभी वह अच्छा खेल सकेगा. वह अच्छा खेलेंगे तभी हमारी टीम जीतेगी. तभी मैं जीतूंगा, तभी भारत जीतेगा. एक बार खिलाड़ी का चुनाव हो जाए तो फिर उसे कोई दुश्चिंता न रहे.

"टीम से दूर रहोगे, बातें अपने अंदर रखोगे तो कभी भी टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी."

आप आपनी टीम के खिलाड़ियों से निजी तौर पर भी बात करते थे?

टीम के खिलाड़ियों से बातचीत करना बहुत ज़रूरी है. आपस में बात करने से अच्छी टीम बनेगी. टीम से दूर रहोगे, बातें अपने अंदर रखोगे तो कभी भी टीम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी.

आपकी टीम में कुछ ऐसे क्रिकेटर भी आए जिन्हें स्वभाव से कुछ मुश्किल माना जाता था?

नहीं. टीम में बहुत अच्छे लोग रहे. मैं यह दावे से कह सकता हूँ कि भारतीय टीम में सचिन तेंदुलकर, अनिल कुंबले, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, महेंद्र सिंह धोनी, हरभजन सिंह, वीरेंद्र सहवाग, ज़हीर ख़ान जैसी हस्तियाँ थीं. ये जितने अच्छे खिलाड़ी थे उतने ही अच्छे इंसान भी. इनकी वजह से भारतीय क्रिकेट आगे बढ़ा है. ख़ासतौर से विदेशों में. पहले जब हम बाहर खेलने जाते थे तब लोग कहते थे कि ये लोग कमज़ोर हैं, डरते हैं, इनमें जिगर नहीं है, एक दो लोग अच्छा खेलेंगे बाकी खेल नहीं पाएंगे, ये जीत नहीं सकते. तो ये लोग जिनके मैंने नाम बताया है, इन्होंने टीम को हिम्मत दी.

सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद आपको कोई क्रिकेट टीम में कोई खालीपन दिखाई देता है?

खालीपन दिखाई देता है. आप 24 साल से देखते आ रहे हो कि चार नंबर पर वो पांच फुट तीन इंच का आदमी खेलता आ रहा था. लेकिन यही ज़िंदगी है. खेल की यही सच्चाई है. कितना भी बड़ा खिलाड़ी हो, एक दिन उसे जाना ही होता है. पेले ने भी फुटबॉल छोड़ा, मैराडोना ने भी फुटबॉल छोड़ा. फुटबॉल में मैराडोना से बड़ा कोई खिलाड़ी नहीं आया. पीट सैंप्रस ने टेनिस छोड़ा. डॉनल्ड ब्रेडमैन, गारफ़ील्ड सोबर्स ने क्रिकेट छोड़ा तो सचिन को भी एक दिन क्रिकेट छोड़ना था. जिस दिन गावस्कर ने क्रिकेट छोड़ा था उस समय सचिन आया था. सचिन के बाद भी कोई ना कोई उनकी जगह लेगा और भारतीय क्रिकेट को आगे लेकर जाएगा.

सचिन तेंडुलकर और सौरभ गांगुली

"सचिन के बाद भी कोई ना कोई उनकी जगह लेगा और भारतीय क्रिकेट को आगे लेकर जाएगा"

भारतीय क्रिकेट के साथ इस समय जो हो रहा है क्या वो कप्तान धोनी की कमज़ोरी है? क्या वो थक गए हैं? या टीम का जिगर ख़त्म हो गया है?

भारतीय टीम ने पिछले सात-आठ महीनों में बेहतरीन क्रिकेट खेली है. लेकिन मुझे लगता है कि दक्षिण अफ्रीका के साथ खेलने से पहले उन्हें तैयारी का समय नहीं मिला. आप सोमवार को दक्षिण अफ़्रीका पहुँचकर बृहस्पतिवार को अंतरराष्ट्रीय मैच खेलेंगे तो जीतना मुश्किल होगा, ख़ासतौर पर उन स्थितियों में जहाँ बैटिंग या बॉलिंग एकदम अलग है.

जब खिलाड़ी की फॉर्म खराब हो जाती है तब बहुत से लोग आलोचना करते हैं और मीडिया भी कई तरह की बातें करता है. उनके बारे में आप क्या कहेंगे?

यह पेशेवर क्रिकेट है. सबकी निगाहें यहाँ होती हैं. आलोचना होगी ही. आपको इसे जीना पड़ेगा. क्रिकेटर्स के लिए मीडिया अच्छा भी कहता है और बुरा भी. आपको केवल इतना ध्यान रखना है कि ऊपर का ग्राफ नीचे के ग्राफ से ज्यादा रहे, तभी आप सफल खिलाड़ी माने जाएंगे.

आपके बारे में बहुत सी जगह पढ़ा कि आप अक्खड़ हैं. अपने सामने किसी को कुछ समझते नहीं हैं. लेकिन आपसे मिलकर तो ऐसा कुछ लग नहीं रहा?

आप ग़लत अखबार पढ़ते थे. मेरे बारे में बहुत सी बातें बनाई गई हैं. ऐसे बहुत सारे पत्रकार हैं जो मेरे बारे में अच्छी बातें भी लिखते हैं.

आप कलकत्ता के बहुत ही अमीर परिवार से आते हैं. लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में बहुत से लोग आते हैं जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि बहुत अच्छी नहीं है. या जो गाँव और कस्बों से आते हैं? जैसे मोहम्मद शामी. उनके बारे में आप क्या सोचते हैं ?

"मैं ज़रूर कोच बनना चाहूंगा. यह मेरी दिल से ख्वाहिश है."

पृष्ठभूमि से कुछ फर्क नहीं पड़ता है. ऊपर वाला किसी पर मेहरबान है, तो किसी को थोड़ी कठिन ज़िंदगी देता है. मोहम्मद शामी के लिए शुरुआत में मुश्किल रही पर अब वो भारत के स्ट्राइक गेंदबाज़ है. ज़िंदगी उनके लिए आगे बहुत कुछ लेकर आएगी. क्रिकेट ऐसा खेल है जो मध्यवर्गीय परिवार से भी खेला जाता है. आजकल छोटे-छोटे शहरों से बड़े-बड़े खिलाड़ी आ रहे हैं. मैंने मोहम्मद शामी को खेलते हुए देखा है. मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ.

जब आपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिया था, तब आपने कहा था कि थोड़ा सा जल्दी हो गया. कुछ साल और खेल सकता था. क्या आपको अफ़सोस होता है ?

नहीं, अफ़सोस नहीं होता. ज़िंदगी में हर चीज़ समय के अनुसार नहीं होती. कुछ जल्दी होती है, कुछ देर से. लेकिन मैं नकारात्मक बातें छोड़ कर सकारात्मक बातों में यकीन रखता हूँ. आप कह सकते हैं शायद एक-दो साल और खेल सकता था. पर ये नकारात्मक बातें छोड़कर भारतीय टीम के लिए जो मैंने 15 साल खेला है, उसकी यादें बहुत अच्छी हैं.

क्या आपकी कोच बनने की भी कोई ख्वाहिश है ?

मैं ज़रूर कोच बनना चाहूंगा. यह मेरी दिल से ख्वाहिश है. पता नहीं नौकरी मिलगी या नहीं. अभी तक इसके लिए अर्ज़ी तो दी नहीं है.

अखबारों में ऐसा लिखा था कि आप और आपकी पत्नी ने प्रेम विवाह किया और शादी से पहले आप उन्हें लेकर घर से चले गए थे? या फिर आप दोनों के परिवारों में दुश्मनी थी?

सौरभ गांगुली

"जो भी एक दूसरे से प्रेम करते हैं और शादी करना चाहते हैं मैं उनके लिए यही कहना चाहूंगा कि अंत में सब ठीक हो जाता है."

ऐसा नहीं है. मैं और मेरी पत्नी बहुत ही पारंपरिक परिवारों से आते हैं. वहाँ प्रेम विवाह नहीं होता था. अपने घर में सबसे पहले मैंने प्रेम विवाह किया था. मेरे पिता के पाँच भाई और सात बहनें थी और किसी ने प्रेम विवाह नहीं किया. जब कोई नई चीज़ होती है तो थोड़ी हलचल तो होती ही है. बस वही था. लेकिन जो भी एक दूसरे से प्रेम करते हैं और शादी करना चाहते हैं मैं उनके लिए यही कहना चाहूंगा कि अंत में सब ठीक हो जाता है.

क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि अच्छा न खेलने के लिए आपनी आलोचना हो रही हो और घर लौटने पर आपकी पत्नी डोना ने भी कहा हो– क्या करते हो सौरभ?

ज़रूर पर इतनी ज़ोर से तो नहीं कहा– क्या करते हो सौरभ. हाँ, ये ज़रूर कहा होगा कि अच्छा खेलना होगा. पर फिर वो मुझसे भी डाँट खाती थी. मैं कहता था तुम इसमें मत पड़ो. मैं मैदान में सँभाल लूँगा. तुम क्रिकेट के बारे में बात मत करो.

तब तो वो और नाराज़ होती होंगी!

नहीं चुप हो जाती थी. दादा नहीं तो कुछ नहीं. वहाँ कुछ नहीं चलता.

घर में आपकी चलती है? या आपकी पत्नी की?

मेरी चलती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए क्लिक करें यहां क्लिक करें. आप हमें क्लिक करें फ़ेसबुक और क्लिक करें ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.