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विश्व कुश्ती चैंपियनशिप: कौन कौन दिखाएंगे दम

 सोमवार, 16 सितंबर, 2013 को 19:59 IST तक के समाचार

हंगरी में सोमवार से शुरू हो रही विश्व कुश्ती चैंपियनशिप भारतीय पहलवानों के लिए अपना दमखम दिखाने का एक बढ़िया मौका है.

ये बात अलग है कि क्लिक करें सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे भारत के स्टार पहलवान चोटिल होने की वजह से इस चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं ले रहे हैं.

वैसे ख़ुद सुशील कुमार का कहना है कि अगर टीम के डॉक्टरों ने अनुमति दे दी तो वो दो-दो हाथ कर सकते है.

सुशील कुमार ने पिछले साल लंदन क्लिक करें ओलंपिक में रजत पदक जीता था. उनके साथी क्लिक करें योगेश्वर दत्त ने भी वहां कांस्य पदक जीता था. अब दोनों ही चोटिल है और उसके बाद से उन्होंने किसी टूर्नामेंट में हिस्सा नही लिया है.

किनसे करें करें उम्मीद

ऐसा नही है कि इस बार भारतीय दल में एक भी ऐसा क्लिक करें पहलवान नहीं है जिससे पदक की उम्मीद हो. इस दल में वैसे तो कुल मिलाकर भारत के 22 महिला और पुरूष पहलवान ताल ठोकने के लिए तैयार हैं.

पहलवानों का जादू

तीन साल पहले का वो पल कुश्ती प्रेमियों को अब भी कल की बात लगता है जब सितंबर 2010 में दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हज़ारों खेल प्रेमी ढोल-नगाडों के साथ जमा थे. आसमान में अभी भोर का तारा नही चमका था, लेकिन सुशील कुमार तो अब तक भारतीय कुश्ती जगत के ध्रुव तारे बन चुके थे.

उन्होंने मॉस्को में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में 66 किलो भार वज़न में मेज़बान देश के ही एलन गोगायेव को हराकर स्वर्ण पदक जीता था. सुशील कुमार के गांव बापलौढा से आए हुए हुजूम में बच्चे, बूढों के अलावा आसपास के क्षेत्रों के आम लोगो के अलावा स्थानीय विधायक और दिल्ली देहात के लगभग सभी जाने-पहचाने अखाड़ों के पहलवान अपने-अपने गुरू-ख़लीफाओं के साथ जमा थे. उनके हाथ में विश्व विजयी पहलवान सुशील कुमार के फोटो वाले बडे-बडे बैनर लहरा रहे थे.

जैसे ही सुशील कुमार गले में स्वर्ण पदक पहने एयरपोर्ट से बाहर निकले भीड़ ने उन्हे अपने कंधों पर बैठा लिया और ढोल-नगाड़ों की तेज़ आवाज़ में उनके और भारत माता की जय-जयकार होने लगी. हम भी उनकी एक झलक पाने को लपके लेकिन भारी भीड़ ने पीछे धकेल दिया.

यह था सुशील कुमार के विश्व चैंपियन बनने का जादू जिसने दिखाया था कि भारत में सिर्फ क्रिकेटर को ही कंधों पर नही बिठाया जाता, बल्कि हर उस खिलाड़ी का सम्मान किया जाता है जिसे कामयाबी मिलती है.

द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित कोच यशवीर सिंह का कहना है कि सबसे ज़्यादा उम्मीद फ्रीस्टाइल वर्ग में 55 किलो भार वर्ग में अमित कुमार, 60 किलो भार वर्ग में बजरंग और 74 किलो भार वर्ग में उतरने वाले नरसिंह पंचम यादव से है.

महिला वर्ग में भारत का दारोमदार गीता और अनुभवी गीतिका जाखड़ पर रहेगा.

वैसे भारतीय महिलाओं ने कनाडा में हुई पिछली विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में दो कांस्य पदक जीते थे. यह कामयाबी गीता फोगाट और बबीता कुमारी ने दिलाई थी. इनके अलावा अलका तोमर भी भारत को कांस्य पदक दिला चुकी है.

निरंतरता का अभाव

अलका तोमर भारत की पहली महिला पहलवान हैं जिन्होंने साल 2006 में चीन के ग्वांग्ज़ू शहर में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता. विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में सुशील कुमार के अलावा भारत के केवल दो पहलवान ही पदक जीत सके है.

भारत को सबसे पहली कामयाबी उदय चंद ने साल 1961 में जापान के योकोहामा में कांस्य पदक जीतकर दिलाई.

उनके अलावा बिशम्बर सिंह ने साल 1967 में दिल्ली में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप मे रजत पदक जीता. ये कामयाबी साबित करती है कि कुश्ती में सफलता भारत को बहुत पहले से मिलती रही है लेकिन उसमें निरंतरता का अभाव रहा है.

अब क्लिक करें कुश्ती ओलंपिक में भी बनी रहेगी लेकिन भारतीय खेल प्रेमियों को इंतज़ार है कि सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त की कमी कौन पूरी करेगा.

इस लिहाज से विश्व कुश्ती चैंपियनशिप का महत्व बढ़ जाता है. भारतीय खेमे का हौसला बढ़ाने के लिए सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त भी हंगरी में ही मौजूद है.

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