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मिल्खा के अलावा और भी हैं स्टार एथलीट

 बुधवार, 31 जुलाई, 2013 को 10:12 IST तक के समाचार
मिल्खा सिंह रोम ओलंपिक

(सभी तस्वीरें लेखक के निजी संग्रह से)

मिल्खा सिंह की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्म 'भाग मिल्खा भाग' बाकी फ़िल्मों की ही तरह किसी को बहुत अच्छी लगी तो किसी को ठीक ठाक.

लेकिन इस बात से कोई नहीं इनकार कर सकता कि इस फ़िल्म ने उस खेल को आम जनता तक पहुंचा दिया जिसने भारत को मिल्खा के अलावा और कई स्टार दिए लेकिन वे लोगों के दिलों तक नहीं पहुंच सके.

आइए हम नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ खिलाड़ियों और उनके योगदान पर.

गुरबचन सिंह रंधावा

बहुत लोगों को यह पता ही नहीं कि गुरबचन सिंह रंधावा ने भी रोम ओलंपिक में हिस्सा लिया था.

उन्होंने रफेर जॉनसन और सी के यंग जैसे दिग्गज क्लिक करें एथलीटों के साथ डेकेथलन मे भाग लिया था.

वह बहुत प्रतिभावान थे और एक साथ जैवलिन, हाइ जंप, लॉन्ग जंप और हर्डल्स के राष्ट्रीय चैंपियन थे.

जब 1964 के खेलों में उन्होंने 110 मीटर हर्डल में पाँचवाँ स्थान हासिल किया तो दुनिया के बड़े-बड़े कोचों ने उनके प्रदर्शन को सराहा था.

सीआरपीएफ से डीआईजी के ओहदे से रिटायर होकर आजकल वह कोचिंग कर रहे हैं. टोकियो में दो बार उन्होंने 14 सेकेंड का समय निकाला था, जो आज भी भारतीय एथलीटों के लिए चुनौती है.

श्रीराम सिंह

मिल्खा और रंधावा 60 के दशक के हीरो थे, तो 70 का दशक श्रीराम सिंह के नाम था.

श्रीराम 1970 के बैंकाक एशियाई खेलों में 800 मीटर का रजत पदक और 1974 में तेहरान में स्वर्ण लेकर वह 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक के लिए तैयार थे.

लेकिन जब दुनिया के बाकी एथलीट यूरोप और अमरीका में प्रतियोगिताओं में भाग लेने की तैयारी कर रहे थे, श्रीराम सिंह जुलाई की भरी बारिश के बीच दिल्ली के नेशनल स्टेडियम के बाहर पानी से भरे घास के मैदान पर प्रैक्टिस कर रहे थे.

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श्रीराम सिंह अब जयपुर में रहते हैं

मॉन्ट्रियाल से पहले उन्होंने कभी टार्टेन ट्रैक पर पाँव भी नहीं रखा था लेकिन वह फाइनल में पहुँचे और 1:45.77 का समय निकाल कर सातवें स्थान पर रहे.

उसी रेस में नया विश्व रिकॉर्ड बना जिसका श्रेय रेस जीतने वेल आलबर्टू जुआंटोरना ने श्रीराम सिंह को दिया.

आज भी क्यूबा के जुआंटोरना श्रीराम को याद करते हैं.

मज़े की बात यह है कि 1:45.77 के समय से श्रीराम आज भी वर्ष 2013 की रैंकिंग में दुनिया में 57 नंबर पर हैं. यह बड़ी बात है.

उनका यह एशियाई रिकॉर्ड 32 साल तक कायम रहा और भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तो अब भी है.

ऐसे मे श्रीराम सिंह क्या किसी अन्य भारतीय एथलीट से कम हैं?

सेना से रिटायरमेंट लेकर श्रीराम एनआइएस बने और वहां से भी रिटायर होकर अब जयपुर में रहते हैं.

मॉस्को ओलंपिक में 800 मीटर का गोल्ड जीतने वेल स्टीव ओवेट के कोच हैरी विल्सन का मानना था कि अगर श्रीराम मॉन्ट्रियल से कुछ महीने पहले इंग्लैंड में उनके पास या भारत के बाहर कहीं और ट्रेनिंग कर लेते तो मॉन्ट्रियल में गोल्ड भी जीत सकते थे.

शिवनाथ सिंह

श्रीराम की ही तरह सेना के एक और एथलीट थे शिवनाथ सिंह. उन्होंने मॉन्ट्रियल खेलों मे हिस्सा लिया.

शिवनाथ सिंह मॉन्ट्रियल में मैराथन में 2 घंटे 16 मिनट और 22 सेकंड का समय निकालकर 11वें स्थान पर रहे.

रेस में 60 एथलीटों ने हिस्सा लिया था और शिवनाथ ने न्यूज़ीलैंड के जाने-माने धावक जेक फॉस्टर को भी पछाड़ दिया था.

श्रीराम की तरह मॉन्ट्रियल जाने से एक हफ़्ते पहले शिवनाथ भी दिल्ली में भागने के लिए ठीक जगह ढूंढ रहे थे जबकि दुनिया के बाकी खिलाड़ी एक महीने पहले मॉन्ट्रियल के मैराथन रूट का जायज़ा ले रहे थे.

ऐसे में शिवनाथ का प्रदर्शन हर हाल में विश्वस्तरीय था.

शिवनाथ सिंह

सेना छोड़कर वह टिस्‍को में शामिल हो गए थे लेकिन कुछ साल पहले उनकी मृत्यु हो गई.

डी वालसम्मा

भारतीय एथलेटिक्स के लिए 80 का दशक अहम रहा.

दिल्ली में 1982 में आयोजित एशियाई खेल में एम डी वालसम्मा ने महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ का स्वर्ण पदक जीता.

वालसम्मा कमलजीत संधु के बाद एशियाई खेलों में गोल्ड जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला थीं.

ख़ास बात यह है कि वालसम्मा को देख कर ही पी टी उषा ने हर्डल्स में हिस्सा लेने का मन बनाया.

वालसम्मा ने लॉस एंजेलेस ओलंपिक में भारत की 4x400 रिले को सातवाँ स्थान दिलवाने में अहम् भूमिका निभाई.

अर्जुन अवॉर्ड और पद्मश्री से नवाज़े जाने के बाद वालसम्मा रेलवे में सीनियर कॉंमर्शियल ऑफ़िसर के रूप में काम कर रही हैं.

हालांकि उनके बाद पी टी उषा ने काफी नाम कमाया लेकिन सही मायनों में भारतीय महिला एथलीटों की क्लिक करें प्रेरणा वालसम्मा ही थीं.

शाइनी विल्सन

अंजू बॉबी जॉर्ज

पेरिस विश्व चैंपियनशिप में पदक लेने के बाद खड़ीं अंजू बॉबी जॉर्ज

पी टी उषा और शाइनी का नाम 80 के दशक में साथ लिया जाता था. दोनों केरल की थीं और दोनों का ही एशिया में दबदबा था.

लेकिन शाइनी की बदकिस्मती ही कही जा सकती थीं कि उन्हें लंबे समय तक कोई ठीक कोच ही नहीं मिला.

1984 में 800 मीटर की रेस के सेमी फाइनल में पहुंचना किसी भारतीय खिलाड़ी के लिए बड़ी बात थी.

वह रिले टीम का भी हमेशा हिस्सा रहीं लेकिन उषा के साथ होने से ज़्यादा नाम उषा का ही हुआ.

शाइनी ने 1995 में 1:59.85 का समय निकाला था. अपने उस प्रदर्शन से वह उस साल की विश्व रैंकिंग में 21 स्थान पर थीं.

ऐसे में शाइनी को विश्वस्तरीय खिलाड़ी कहना और भारत के महान एथलीटों मे गिनना गलत नहीं होगा.

शाइनी आजकल फूड कॉर्पोरेशन में जनरल मैनेजर के पद पर हैं.

अंजू जॉर्ज

ठंडे दिमाग से सोचा जाए तो अंजू बॉबी जॉर्ज का प्रदर्शन किसी भी भारतीय एथलीट से थोड़ा ज़्यादा ही होगा.

पेरिस विश्व चैंपियनशिप में काँस्य पदक, वर्ल्ड फाइनल में रजत पदक, कॉमनवेल्थ खेलों मे काँस्य पदक, दोहा एशियाई खेलों में स्वर्ण और एथेंस ओलंपिक में छठा स्थान.

ये सब ऐसे खिताब हैं जिन्हें अंजू के अलावा किसी भारतीय एथलीट ने नहीं जीता है लेकिन एथलेटिक्स में विडंबना यह है कि ट्रैक के इवेंट को ज़्यादा भाव दिया जाता है क्योंकि वह लोगों को दिखता है.

लॉन्ग जंप में जब तक बोर्ड पर अंतिम परिणाम न दिखे लोगों को मज़ा नहीं आता. वरना अंजू- मिल्खा, रंधावा या उषा से किसी भी बात मे कम नहीं हैं.

माँ बनने के बाद अंजू ने हाल ही में एथलेटिक्स छोड़ा है और बैंगलूर में कस्टम ऑफिसर हैं.

4X400m महिला रिले टीम

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भारतीय महिला रिले टीम ने सियोल एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था

इन सितारों के साथ-साथ भारतीय महिला रिले टीम भी किसी से कम नहीं है.

रिले टीम का सिलसिला शुरू हुआ था लॉस एंजेलेस ओलंपिक खेलों से जहाँ वंदना राव, शाइनी विलसन, वालसम्मा और पी टी उषा ने फाइनल मे पहुँचकर सबको चौंका दिया था.

हालाँकि फाइनल में टीम आठवें स्थान पर रही लेकिन 3:32.49 का समय एशियाई रिकॉर्ड था.

उसके बाद इसी टीम ने सोल एशियाई गेम में स्वर्ण पदक जीता.

एशियाई स्तर पर तो भारतीय टीम ने हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया है और विश्व रैंकिंग में रही है.

प्रवीण कुमार

प्रवीण कुमार

और अब बात एथलेटिक्स के उस सितारे की जिसने मिल्खा सिंह से बहुत पहले बॉलीवुड और टीवी की दुनिया में कदम रखा.

प्रवीण कुमार की शिकायत यह है कि उन्हें लोग एथलेटिक्स के लिए नहीं बल्कि महाभारत धारावाहिक में भीम के उनके किरदार के लिए जानते हैं.

प्रवीण कुमार डिस्कस थ्रो में कई साल नेशनल चैंपियन रहे, एशियाई चैंपियन रहे और मैक्सिको ओलंपिक भी गए लेकिन उनका कहना है कि उन्हें भीम के नाम से ज़्यादा लोग जानते हैं.

वैसे भी खेल अधिकारियों से वो इतना तंग आए कि मैक्सिको से लौटते ही उन्होंने अपना ओलंपिक का ब्लेज़र सूटकेस में रख दिया और आज तक दोबारा नहीं पहना.

ऐसे में अगर लोग भारतीय एथलीटों को भूल जाएं तो अफसोस की बात तो है ही.

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