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क्या हॉकी का जादूगर बन पाएगा भारत रत्न?

 शनिवार, 20 जुलाई, 2013 को 11:56 IST तक के समाचार
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की प्रतिमा

2011 में ध्यानचंद को खेलरत्न दिए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई थी.

भारत के खेल मंत्रालय ने हॉकी का जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का नाम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया है.

इस ख़बर पर मेजर ध्यानचंद के बेटे पूर्व ओलम्पिक खिलाड़ी अशोक कुमार ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा, "यह सही मायने में हमारे परिवार के लिए अच्छी ख़बर है लेकिन यह हॉकी के उन दीवानों के लिए भी शुभ समाचार है जो ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर के तौर पर जानते हैं. यह पुरस्कार उन लोगो को समर्पित है जिन्होंने हॉकी से लगाव रखा."

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अशोक कुमार ने साल 1975 में विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट के फ़ाइनल में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एकमात्र तथा निर्णायक गोल दाग़ कर भारत को विजेता बनाया था.

उन्हें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि आख़िरकार लम्बे समय बाद ही सही भारत के खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद के नाम को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए प्रस्तावित किया है.

खेल रत्न

"यह सही मायने में हमारे परिवार के लिए अच्छी खबर है लेकिन यह हॉकी के उन दीवानों के लिए भी शुभ समाचार है जिन्होंने ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर के तौर पर जानते हैं. "

अशोक कुमार, मेजर ध्यानचंद के बेटे

पिछले कुछ सालों से खेल जगत में इस बात को लेकर बहस चल रही थी कि खेलों के क्षेत्र में भारत के लिए उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न के लिए पहला नाम किसका हो ?

इससे पहले साल 2011 में सांसदों ने मेजर ध्यानचंद के नाम को खेल रत्न के लिए प्रस्तावित किया था लेकिन तब सरकार ने मंज़ूरी नही दी थी.

भारत के खेल प्रेमियों में कई बार इस बात को लेकर दिलचस्प चर्चा रही है कि भारत रत्न ध्यानचंद, सचिन तेंदुलकर, पर्वतारोही तेनसिंह नोर्गे और बीजिंग ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा को मिले.

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लेकिन आख़िरकार मेजर ध्यानचंद का नाम प्रस्तावित हुआ.

उल्लेखनीय है कि मेजर ध्यानचंद ने 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लॉस एंजीलिस और 1936 में बर्लिन में हुए ओलम्पिक खेलों में भारत को स्वर्ण पदक जीताने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

इतिहास में मशहूर

मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार

ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने फैसले पर खुशी जाहिर की है.

बर्लिन ओलम्पिक में तो जर्मनी के शासक हिटलर ने ध्यानचंद के खेल से खुश होकर उन्हें अपनी सेना में सर्वोच्च पद देने की पेशकश की थी जिसे उन्होंने यह कहकर विनम्रता से ठुकरा दिया कि "मुझे मेरा देश भारत सबसे अच्छा लगता है. मुझे कुछ नही चाहिए."

इसके अलावा बर्लिन ही वह जगह थी जहाँ ओलम्पिक के दौरान कई बार उनकी हॉकी स्टिक यह कहकर बदली गई कि कहीं इसमें चुम्बक तो नही लगी है.

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वैसे तो मेजर ध्यानचंद के बारे में अनेक क़िस्से मशहूर हैं लेकिन उनके बारे में बेहद सम्मान के साथ पुराने हॉकी खिलाड़ी कहते हैं कि ग़ुलाम भारत में कभी उसकी पहचान हॉकी, गांधी और ध्यानचंद की वजह से ही थी.

अगर खेलों के इतिहास में सबसे मशहूर खिलाड़ियों की बात की जाए तो फ़ुटबॉल में पेले और मुक्केबाज़ी में मोहम्मद अली की तरह ही उनका नाम सम्मान से लिया जाता था.

हालांकि मेजर ध्यानचंद हमारे बीच नही हैं लेकिन अगर मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न पुरस्कार मिल जाता हो तो फिर दूसरे खिलाड़ियों को भी उनसे प्रेरणा मिलेगी.

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