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क्रिकेट के कलाकार की विदाई

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 18:17 IST तक के समाचार

वीवीएस लक्ष्मण की बल्लेबाज़ी में एक खास नाज़ुकता थी जो उनके स्ट्रोक लगाने की क्षमता को औऱ रौशन करती थी.

उनकी इसी खासियत ने लक्ष्मण को भारतीय क्रिकेट के सुनहरे काल में मध्य क्रम में सबसे ज्यादा प्यार पाने वाला बल्लेबाज़ बना दिया था.

लक्ष्मण का अंदाज़ पुराने दिनों के उन मखमली बल्लेबाज़ी का उदाहरण था.

उनके साथ बल्लेबाज़ी करने वाले 'फैब फ़ोर' के बाकी बल्लेबाज़ों को आश्चर्य के नज़रों से देखा जाता था, लेकिन लक्ष्मण की कमज़ोरी उन्हें इंसान बनाती थी और इसलिए उन्हें प्यार भी ज़्यादा मिलता था.

जो लोग उनसे कभी नहीं मिले थे वो भी उन्हें एक शांत और नम्र आदमी मानते थे, सिर्फ उनका कवर ड्राइव या लेग ग्लांस देखखर लोग उनके बारे में अनुमान लगाते थे.

फ़ैन क्लब

लक्ष्मण के सबसे बड़े प्रशंसक उनकी टीम में ही थे.

वर्ष 2004 में सिड़नी टेस्ट में उन्होंने सचिन तेंदुलकर के साथ 353 रनों की साझेदारी की थी. इस पारी में सचिन ने 241 रन बनाए थे लेकिन लक्ष्मण की पारी देखकर उनका कहना था, "मैने सिर्फ यही फैसला किया था की दूसरी छोर पर खड़ा हो जाऊं और उनकी बल्लेबाज़ी का लुत्फ़ उठाऊं."

दरअसल दूसरी छोर पर खड़े होकर लक्ष्मण की बल्लेबाज़ी का आनंद उठाना उनके साथी खिलाड़ियों को बहुत पसंद था.

कोलकाता में राहुल द्रविड़ ने उनके साथ 376 रनों की मशहूर साझेदारी की थी जिसने ऑस्ट्रेलिया के हाथों से जीत छीन ली थी.

"मैने सिर्फ यही फैसला किया था की दूसरी छोर पर खड़ा हो जाऊं और लक्ष्मण की बल्लेबाज़ी का लुत्फ़ उठाऊं."

सचिन तेंदुलकर

उस पारी के बाद द्रविड़ ने कहा, "दूसरी छोर से उनकी बल्लेबाज़ी देखना ऐसा था जैसे टीवी पर हाईलाइट पैकैज देख रहा हूं."

लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज़ लगातार शतक लगाने या बेहतरीन औसत की वजह से नहीं जाने जाते. उन्हें याद रखा जाता है अपने युग की यादगार पारी खेलने के लिए.

कोलकता में उनके 281 रन ने भारतीय क्रिकेट के सुनहरे युग का आगाज़ किया और उस पारी को कई बार किसी भारतीय द्वारा खेली गई सर्वश्रेष्ठ पारी चुना गया है.

आसान बल्लेबाज़ी

लक्ष्मण ने 134 टेस्ट खेले लेकिन वो कभी भी कप्तानी की दौड़ में नहीं रहे ये हैरानी की बात है.

वो कभी भी विश्व कप नहीं खेले और करियर की शुरुआत में तो टेस्ट टीम में ही उनकी जगह पक्की नहीं मानी जाती था.

टीम में उनकी जगह कई बार ऐसे लोगों ने ली जो कभी एक टेस्ट से ज्यादा नहीं खेल सकते थे और यही चयनकर्ताओं की अदूरदर्शिता का उदाहरण ही था. शायद उन्हें लगता था कि इतनी आसानी से वो बल्लेबाज़ी कर लेते हैं वो कहीं आरामपरस्ती तो नहीं.

लक्ष्मण के सबसे बड़े प्रशंसक उनकी टीम में ही थे.

लक्ष्मण जो भी करते थे वो बहुत आसान लगता था लेकिन उसे लापरवाही कतई नहीं कहा जा सकता था.

8781 रनों के साथ लक्ष्मण तेंदुलकर, द्रविड़ और गावस्कर के बाद भारतीय बल्लेबाज़ों में चौथे नंबर पर है.

लेकिन भारतीय क्रिकेट के महान खिलाड़ियों में उनकी गिनती इस वजह से नहीं है. उनकी महानता तो बल्लेबाज़ी में उनके कलाई के उपयोग के कारण गिनी जाएगी.

कलात्मकता

कलाई का इस्तेमाल कर कलात्मक बल्लेबाज़ी में वो सबसे आगे थे, जिसके लिए भारतीय क्रिकेट को जाना जाता है.

लक्ष्मण ने भारत के लिए वो मैच जिताए जो हारे हुए लगते थे. खासकर नौ, दस और ग्यारह नंबर के साथ खेलते हुए उन्होंने भारत को कई मैच जिताए. इसके अलावा स्लिप में कैच लेने के मामले में वो द्रविड़ से सिर्फ थोड़ा ही पीछे थे.

16 साल तक अंतरराष्ट्रीय़ क्रिकेट खेलते हुए लक्ष्मण ने शालीनता की नई परिभाषा रची. वो कभी भी खराब स्ट्रोक नहीं खेल सकते थे.

उन्हें आराम करने का और अपने परिवार को समय देने का पूरा हक़ है. साथ ही अपना आखिरी सपना - हैदराबाद को रणजी जिताने के भी वो पूरे हक़दार हैं.

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