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सुशील के गांव की खुशियां और फिर अंधकार

 सोमवार, 13 अगस्त, 2012 को 00:46 IST तक के समाचार
सुशील

सुशील के पदक मिलने के बाद सभी झूम उठे.

लंदन ओलंपिक में भारत को रजत पदक दिलाने वाले पहलवान सुशील का गांव बापरोला यूं तो राजधानी दिल्ली का हिस्सा है लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए आपको टूटी, ऊबड़-खाबड़ सड़कों से हो कर जाना पड़ता है जिसकी वजह से कई बार शक होता है कि आप दिल्ली में है भी या नहीं.

यह संदेह कुछ और बढ़ जाता है जब वहां पहुंचते ही गांव वालों बताते हैं कि सात घंटे से बिजली बंद है.

गांव वालों की कई शिकायते हैं लेकिन आज के दिन लोग शिकायतों पर कम ध्यान दे रहे हैं.

सुशील कुमार से उनके परिवार और गांव वालों को स्वर्ण पदक की उम्मीद थीं लेकिन वो फाइनल में जापान के योनेमित्सू तातसुहीरो से हार गए और उन्हें सिर्फ रजत पदक से संतोष करना पड़ा. लेकिन नजफगढ से सटे बापरोला गांव के सुशील कुमार इतिहास तो रच ही चुके हैं. ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाले वो भारत के पहले पहलवान हैं.

वैसे उनके गांव में रविवार को सुबह से ही फिज़ा में चहल पहल थी. लंदन की ओलंपिक खेलों के आखिरी दिन का इंतजार जितना यहां के लोगों ने किया है वैसा किसी और ने नहीं किया होगा.

घर पर लोगों का तांता

पहले कवॉर्टर फाइनल में पहुंचे और फिर शानदार खेल की बदौलत सेमीफाइनल और फिर फाइनल में.

घर पर मीडिया ने सीधा प्रसारण करने वाली ओबी वैनों के साथ धावा बोल दिया था. सुशील के यार दोस्त, रिश्तेदार तो आए ही, साथ ही वो भी आए जो आसपास रहते हुए इस द्वार के अंदर पहले कभी नहीं आए थे.

कोई मिठाई के डिब्बे ला रहा था तो कोई बस उम्मीद भरी मुस्कान चेहरे पर लिए चला आ रहा था.

सुशील

सुशील की मां और घर पर बाकी महिलाएं.

वैसे घर आने वालों में कुछ स्थानीय नेता भी थे जो सफेद दाग़दार कुर्ते पहने स्वर्ण पदक की इसलिए आस लगाए थे कि इससे उनके टीवी पर नज़र आने की संभावना दोगुनी हो जाएगी.

एक के साथी ने तो कह भी दिया, ''इनकी बाइट लीजिए. फलां फलां पार्टी के नेता हैं.''

इन सबके बीच सुशील के पिता दीवान सिंह घर के अंदर बाहर टहल रहे थे. चेहरे पर थोड़ा तनाव झलक रहा था. पहलवानी उन्होंने भी की है. इसलिए जानते थे कि सुशील का आगे का रास्ता इतना आसान नहीं है.

मीडिया को देखकर प्रसन्न थे लेकिन कोई साक्षातकार या बाइट के लिए कहता तो मना करते हुए कहते, ''भाई, बस इस मैच के बाद.'' और फिर धीरे से कहते, ''भगवान से प्रार्थना करना.''

तनाव का एक कारण और भी है. बोले, ''सात घंटे से बिजली नहीं है. आप मीडिया वाले क्यों नहीं कुछ करते. यह शीला की दिल्ली का हाल है. मैच तो इंवर्टर पर देख ही लेंगे फिर भी.''

नया घर, पुराना घर

सुशील का घर एक तरह से दो हिस्सों में बटा है. एक तो पुराना हिस्सा है और बगल में घर का दूसरा हिस्सा है, जो हाल में ही में बना है.

पुरानी हिस्से का द्वार मेन रो़ड पर खुलता है. इस हिस्से में सभी पुरुष थे जबकि दूसरे हिस्से में महिलाएं थी और साथ कुछ बच्चे.

लगभग सभी महिलाओं के सिर पर चुन्नी थी हालांकि एक दो महिलाओं ने अपने चेहरे भी ढक रखे थे. इन्हीं के बीच सुशील की मां जो थोड़ी घबराई लग रही थी.

पूछने पर उन्होंने कहा, ''मेरे बेटे के हाथ में चोट लगी है. पता नहीं ज्यादा गंभीर तो नहीं है.'' घर के दोनों हिस्सों में टीवी लगे हैं. और दोनों पर स्पोर्टस चैनल लगा था.

हर दो चार मिनट के बाद कोई अंदर आता और वहां बैठे लोगों से पूछता, ''शुरु हुआ क्या?''

हार से शुरुआत

सुशील

सुशील के घर तक पहुंचने के लिए आपको टूटी, ऊबड़-खाबड़ सड़कों से हो कर जाना पड़ता है.

आखिर मैच शुरु हो ही गया. और जब शुरु में सुशील पिछड़ने लगे तो दिल टूटे लेकिन आस नहीं. एक बोला कि दिन में भी वो एक मैच में शुरुआत में पिछड़े थे मगर फिर भी जीत गए थे.

लेकिन फिर आशा निराशा में बदल गई. सुशील हार गए और सन्नाटा सा पसर गया.

पिता दीवान सिंह सबसे अधिक निराश थे. लेकिन उनके आगे माइक रख दिया यह जानते हुए कि इतिहास तो रचा गया है क्योंकि सुशील पहले भारतीय बन गए थे जिन्होंने लगातार दो ओलंपिक में पदक जीता था और पहले रजत पदक जीतने वाले पहलवान भी.

निराशा, फिर खुशी

लेकिन पिता का गुस्सा और मायूसी साफ झलक रही थी. बोले, ''ये प्रेक्टिस की कमी है. मैं बहुत निराश हूँ.''

कुछ ही क्षण लगे इस निराशा को खुशी में बदलने में. और फिर फोड़े जाने लगे पटाखे और बजने लगे ढोल-नगाड़े.

पिता की निराशा भी कम हुई और बोले, ''मुझसे अधिक भाग्यवान पिता कोई नहीं हो सकता.''

घर की बाकी औरतों से घिरी मां कमला देवी ने तो सोच लिया है कि बेटे के लिए ढेर सारा मक्खन तैयार करना है और उसकी पसंद के बाकी के पकवान भी.

फिर वहां अंधकार फैल गया. बिजली एक बार फिर चली गई. मानो सरकार का फरमान आया हो...बस बहुत हो गया नाच गाना.

और सारी भीड़ तितर-बितर हो गई.

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