हॉकी: स्वर्णिम इतिहास दोहरा पाएगी भारतीय टीम?

 शुक्रवार, 27 जुलाई, 2012 को 15:51 IST तक के समाचार

लदंन में भारतीय हॉकी टीम एक बार फिर ओलंपिक खेलों में दिखाई देगी.

दरअसल 8 बार ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाला भारत लदंन से पहले 2008 में बीजिंग ओलंपिक में अपनी जगह नही बना पाया था. ऐसा भारतीय हॉकी टीम के साथ पहली बार हुआ.

वर्ष 1928 में एम्सटर्डम में आयोजित ओलंपिक खेलों में भारत पहली बार हॉकी के मैदान में उतरा और फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को 6-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता.

इससे पहले हॉकी को ओलंपिक में शामिल करने का श्रेय लदंन को जाता है जब वर्ष 1908 में वहॉ आयोजित हुए ओलंपिक खेलों में हॉकी को जगह मिली.

इंग्लैंड ने आयरलैंड को हराकर स्वर्ण पदक जीता. तब और उसके बाद वर्ष 1920 में एंटवर्प में हुए ओलंपिक खेलों में भारत ने हॉकी की स्पर्धा में भाग नही लिया.

स्वर्ण पदक

वर्ष 1928 में पहली बार ओलंपिक खेलों में खेलते हुए स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम ने इसके बाद वर्ष 1932 में लास एंजेलिस और वर्ष 1936 में बर्लिन ओलंपिक खेलों में भी स्वर्ण पदक जीतकर तहलका मचा दिया.

तब तक हॉकी और भारत जैसे एक दूसरे के पर्यायवाची हो चुके थे. मेजर ध्यानचंद के नाम का डंका हॉकी के जादूगर के रूप में पूरी दुनिया में बज रहा था. इसके बाद विश्व युध के कारण वर्ष 1940 और 1944 में ओलंपिक खेलों का आयोजन नही हो सका.


वर्ष 1948 में ओलंपिक खेलों का बिगुल लदंन में बजा. अब भारत एक आजा़द देश था और आजा़दी के बाद उसने पहला स्वर्ण पदक हॉकी में ही जीता, वो भी फाइनल में ब्रिटेन को 4-0 से हराकर.

फाइनल से पहले भारत ने ऑस्ट्रिया को 8-0, अर्जेंटीना को 9-1 से और स्पेन को 2-0 से मात दी. सेमीफाइनल में भारत ने नीदरलैंडस को 4-0 से हराया.

इसके बाद फाइनल में भारत ने जीत का परचम फहराकर लगातार चौथी बार स्वर्ण पदक जीतकर दिखी दिया कि आजा़दी के बाद हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल बनाना कितना उचित था.

आज भी उस फाइनल की यादें पहली बार ओलंपिक खेलने उतरे बलबीर सिंह सीनियर के ज़हन में ताजा़ हैं, उन्होंने कहा, "देश नया-नया आजा़द हुआ था, तिरंगा पहली बार ओलंपिक में लहराया, भारत की राष्ट्रीय धुन बजी, दुनिया ने सलाम किया, इससे अधिक खुशी क्या होगी."

फाइनल की यादें

बलबीर सिंह सीनियर

पूर्व खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर 1948, 1952, 1956 ओलंपिक में स्वर्ण पदक विजेता रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य और कप्तान थे.

फाइनल में उन्होने 2 गोल किए. इसी टीम के एक और सदस्य रहे केशव दत्त भी उन पलो को याद करते है, "फाइनल वाले दिन वैम्बले में बारिश हो रही थी. मैं, बाबू और टीम के कप्तान किशन सिंह नंगे पाँव खेल रहे थे, क्योकि हमारे पास स्टड-बूट नही थे. पूरी रॉयल फैमिली वैम्बले स्टेडियम में मौजूद थी, 4-0 से मैच जीता, फिर जी भरकर भागंडा़ किया."

आज हमारे बीच उसी टीम का अहम हिस्सा रहे सरदार त्रिलोचन सिंह नही हैं, लेकिन उनसे कुछ साल पहले चंडीगढ़ में प्रीमियर हॉकी लीग के फाइनल में मुलाका़त हुई तो वो हॉकी की वर्तमान दशा से बेहद निराश थे.

हॉकी का जिक्र चलते ही त्रिलोचन सिंह बोले, "वर्ष 1982 के एशियाई खेलों के बाद हॉकी की कमेंट्री सुनना छोड दिया. वजह ये कि जब फाइनल में पाकिस्तान ने सातवां गोल दागा तो रेडियो तोड़ दिया. अब बडे़ दिनो बाद घरवालों के कहने पर मैच देखने आ गया."

बहुत कुरेदने पर आखिरकार उनके अदंर का खिलाडी़ बाहर आ ही गया, अचानक उनके चेहरे पर चमक आ गई और वो कहने लगे, "उस दौर की बात ही कुछ और थी.सब देश के लिए ही खेलते थे."

जीत का 'नशा'

अपने सबसे बेहतरीन मैच की बात चलने पर उन्होने कहा, "लदंन ओलंपिक का फाइनल जब तेज़ बारिश के बीच जीत हासिल की. उस जीत का नशा ही कुछ और था. शाबाशी मिली जबकि आज तो खिलाडि़यों को सब कुछ मिलता हैं. वैसे पुरस्कार की बात चलने पर बलबीर सिंह सीनियर और केशव दत्त का भी कुछ ऐसा ही कहना रहा."

"वर्ष 1982 के एशियाई खेलों के बाद हॉकी की कमेंट्री सुनना छोड दिया. वजह ये कि जब फाइनल में पाकिस्तान ने सातवां गोल दागा तो रेडियो तोड़ दिया. अब बडे़ दिनो बाद घरवालों के कहने पर मैच देखने आ गया."

त्रिलोचन सिंह, पूर्व हॉकी खिलाड़ी

पिछले दिनो लदंन रवाना होने से पहले दिल्ली के पांचसितारा होटल में आयोजित विदाई समारोह में भारतीय हॉकी टीम के सदस्य उन खिलाडि़यो से मिले जो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के सदस्य रह चुके हैं.

कुछ खिलाडि़यों ने तो पहली बार उसे हाथ से छुआ और महसूस किया कि देश के लिए पदक का क्या महत्व हैं वो भी तब जब वो सोने का हो.

ये अहसास उन्हें कराया 1964 में टोक्यो में हुए ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के सदस्य रहे गुरबक्श सिंह ने जिनके पास वो स्वर्ण पदक अमूल्य धरोहर की तरह मौजूद है.

अब लाख टके का सवाल ये हैं कि क्या लदंन की वो सुहानी यादें एक बार फिर भारतीय हॉकी टीम में जोश भर पाएंगी ?

वर्ष 1980 में मॉस्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद भारतीय हॉकी टीम उसके बाद पदक जीतना तो दूर किसी भी ओलंपिक के सेमिफाइनल तक भी नही पहुँची.

अब किसी तरह लदंन के लिए क्वालिफाई करने वाली भारतीय हॉकी टीम किस पदक के कितना नज़दीक पहुँचती हैं, ये तो वक्त ही बताएगा, जो अब बेहत करीब आ चुका हैं.

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