इस बार आत्मविश्वास से भरी हैं बोम्बेला

 मंगलवार, 24 जुलाई, 2012 को 16:44 IST तक के समाचार
बोम्बेला

तीरंदाज बोम्बेला देवी का यह दूसरा ओलंपिक है. बोम्बेला ने भारतीय टीम में मजबूत जगह बनाई है.

बोम्बेला देवी ने जब पहली बार तीरकमान उठाया तो उनके लिए कमान खींचना भी मुश्किल था. पहला निशाना टारगेट स्टैंड के निचले हिस्से पर लगा.

लेकिन बोम्बेला ने कुछ ही समय में खुद को तीरंदाज़ी के भविष्य के रूप में पेश कर दिया.

लंदन ओलंपिक में भारतीय महिला तीरंदाज़ी टीम की सदस्य बोम्बेला ज़बरदस्त आत्मविश्वास के साथ लंदन जा रही हैं.

मेडल की उम्मीद

बीबीसी से साथ बातचीत में मणिपुर की तीरंदाज़ बोम्बेला ने कहा, “हमने ठान रखा था कि ओलंपिक के लिए हमें हर हाल में क्वालिफाई करना है. इटली में वर्ल्ड चैम्पियनशिप में हमने क्वालिफाई किया. इसके लिए हमने काफी कड़ी ट्रेनिंग की थी. क्वालिफाई करने के बाद हमने कोरियाई टीम को हराया. उसके बाद से ही मुझे लगने लगा है कि हम भी लंदन ओलंपिक में मेडल जीत सकते हैं.”

रोचक पहलू यह है कि पिता ने बोम्बेला का नाम बॉंबे शहर पर रखा था क्योंकि उन्हें वह शहर काफी पसंद है.

रेलवे की इस तीरंदाज़ ने इसी साल जनवरी में जमशेदपुर में 32वीं सहारा सीनियर नेशनल चैम्पियनशिप में दो राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए हैं.

"हमने ठान रखा था कि ओलंपिक के लिए हमें हर हाल में क्वालीफाई करना है. इटली में वर्ल्ड चैंपियनशिप में हमने क्वॉलीफाई किया. इसके लिए हमने काफी कड़ी ट्रेनिंग की थी. क्वॉलीफाई करने के बाद हमने कोरियाई टीम को हराया. उसके बाद से ही मुझे लगने लगा है कि हम भी लंदन ओलंपिक में मेडल जीत सकते हैं"

तीरंदाज़ बोम्बेला देवी

जबकि भारतीय टीम के नाम पिछले साल तूरीन में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप का सिल्वर मेडल है.

बीजिंग की घबराहट

बोम्बेला के लिए यह दूसरा ओलंपिक है. बीजिंग में वह काफी कम अनुभव के साथ गई थी.

लेकिन पिछले चार सालों में बोम्बेला ने भारतीय टीम में मजबूत जगह बनाई है.

बोम्बेला ने बताया, “बीजिंग मेरा पहला ओलंपिक था. मेरे लिए वह सबसे बड़ी स्पर्धा थी. मैं वहां पर काफी घबरा गई थी. गैलरी में सैंकड़ों लोग थे. वह मंजर आज भी मेरे सपने में दिखाई देता है. थोड़ा डर अब भी है लेकिन कोरियन टीम को हराने के बाद हम सभी का आत्मविश्वास काफी मजबूत है.”

लंदन का लक्ष्य

बोम्बेला ने इस ओलंपिक में अपने लिए लक्ष्य भी निर्धारित किए हैं. उन्हें उम्मीद है कि इस बार उनका निशाना किसी-न-किसी पदक पर लगेगा.

उन्होंने कहा, “ओलंपिक में मेडल जीतना बड़ी बात है. जब से मैंने क्वालिफाई किया है, मेरे मन में है कि कम-से-कम एक मेडल जीतना है. तीन स्पर्धाओं में एक में तो हम पदक की उम्मीद कर रहे है. ”

भारतीय महिला तीरंदाज़ी टीम में बोम्बेला के अलावा नगालैंड की चक्रोवालू स्वुरो और झारखंड की दीपिका कुमारी शामिल हैं. तीनों सिर्फ एक टीम ही नहीं बल्कि एक परिवार की तरह हैं.

बोम्बेला कहती है, “हम तीनों के बीच काफी अच्छा तालमेल है. क्योंकि टीम स्पर्धा में किसी एक से गलती होने पर संभावनाओं पर बुरा असर पड़ता है. किसी से कोई गलती होने पर हममें से ही कोई समझाने की कोशिश करता है. अभ्यास के दौरान हम सभी एक दूसरे की मदद करते हैं.”

मां का योगदान

बोम्बेला छोटी थीं, तो उन्होंने अपने माता-पिता से कहा कि वह कोई खेल खेलना चाहती हैं. मां राष्ट्रीय तीरंदाज़ होने के अलावा कोच भी थी. जाहिर है कि बोम्बेला के लिए किसी दूसरे खेल मे गुजांइश कम थी.

"हम तीनों के बीच काफी अच्छा तालमेल है. क्योंकि टीम स्पर्धा में किसी एक से गलती होने संभावनाओं पर बुरा असर पड़ता है. अभ्यास के दौरान हम सभी एक दूसरे की मदद करते हैं."

बोम्बेला देवी

बोम्बेला ने बताया, “मेरी मम्मी जब पहली बार मुझे तीरंदाज़ी के लिए लेकर गईं, तो शुरु में तो तीर कमान देखकर समझ ही नहीं आया कि यह क्या है. मुझ से तो कमान भी नहीं खींची गई थी. ”

इसके बाद बोम्बेला ने सुबह-शाम अभ्यास शुरू किया और कुछ ही समय में उन पर की गई मेहनत ने रंग दिखाना शुरू कर दिया.

आज बोम्बेला ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा हैं. लेकिन इतने लंबे समय से सर्किट में रहने के बावजूद न सिर्फ बोम्बेला बल्कि महिला तीरंदाज़ टीम के लिए पहचान का संकट बना हुआ है.

बोम्बेला बताती है, “हम सभी एक जैसी ड्रेस पहन कर बाहर जाती हैं तो कई बार लोग पूछते हैं कि कौन सी टीम है. ऐसी स्थिति में काफी अजीब लगता है. क्योंकि लोग तीरंदाज़ी के बारे में जानते नहीं हैं.”

ओलंपिक जैसी बड़ी स्पर्धाओं में डोपिंग को लेकर खिलाड़ियों में काफी डर बैठ चुका है. इसका असर उनके खान-पान पर भी पड़ा है.

बोम्बेला ने इस बारे में बताया, “खाने के बारे में थोड़ा ध्यान रखना पड़ता है. बाहर से कुछ मंगाने से पहले अनुमति लेनी पड़ती है क्योंकि कुछ भी दिक्कत हो सकती है. कैंप में भी डॉक्टर से बात करने के बाद ही कोई दवा खाने की सलाह है.”

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