
पहलवान सुशील के अनुसार उन पर कोई दबाव नहीं है. लंदन ओलंपिक में वह अपना सौ फीसदी प्रर्दशन देंगे
चार साल पहले बीजिंग ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार का कांस्य पदक भारतीय कुश्ती में चमक डालने के लिए काफी साबित हुआ था.
यकीनन सुशील पर इस बार सिर्फ करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का ही भार नहीं होगा. उनके जहन में अपने गुरु सतपाल के गुरुजी का सपना भी है. सपना किसी भारतीय पहलवान के गले में ओलंपिक का गोल्ड मेडल देखने का है.
बीबीसी से बातचीत में सुशील ने कहा, मै अपने गुरू के गुरुजी का सपना पूरा करने में कोई कसर नहीं छोडूंगा. खुद मेरे गुरु सतपाल सालों से ओलंपिक में पदक का सपना देखते आए हैं. इस बार भी उन्होंने हमें तैयार करने के लिए दिन-रात एक कर दिए हैं.
"मै अपने गुरू के गुरुजी का सपना पूरा करने में कोई कसर नहीं छोडूंगा. खुद मेरे गुरु सतपाल सालों से ओलंपिक में पदक का सपना देखते आए हैं. इस बार भी उन्होंने हमें तैयार करने के लिए दिन-रात एक कर दिए हैं"
सुशील कुमार
एक बार गुरु हनुमान ने कहा था कि उनकी आत्मा को तभी शांति मिलेगी जब कोई भारतीय पहलवान ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतेगा. सतपाल ने भी कई मौकों पर अफसोस जताया था कि वह अपने गुरुजी का सपना पूरा नहीं कर पाए.
जबरदस्त ट्रेनिंग
सुशील ने बताया कि इस समय ओलंपिक के लिए जबरदस्त ट्रेनिंग चल रही है.
सुशील ने कहा, गुरू सतपाल ही हमारी ट्रेनिंग का पूरा कार्यक्रम तैयार करते हैं. हम सभी उसी के हिसाब से ट्रेनिंग करते हैं. ट्रेनिंग को कई सत्र में बांटा गया है. यह सुबह चार बजे भी शुरू होती है.
उन्होंने कहा कि उन पर कोई दबाव नहीं है. क्योंकि दबाव में रह कर वे अच्छा नहीं कर पाएंगे. लेकिन उनकी कोशिश अपना सौ फीसदी प्रदर्शन करने की रहेगी.
सुशील ने बताया, मेरे कोच ट्रेनिंग में बताते रहते हैं कि प्रतिद्वंद्वी पहलवान के खिलाफ कैसी तैयारी करनी है. वे उनके वीडियो दिखा कर उनकी कमजोरियों और मजबूती के बारे में बता कर रणनीति तैयार करते हैं.
चोट आम बात
सुशील को चोटिल होने के कारण क्वालिफाई करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा. बीजिंग ओलंपिक से भी वह कंधे पर नीले निशान से साथ लौटे थे. सुशील का मानना है कि मौजूदा कुश्ती में चोटिल होना अब आम बात है.
सुशील ने बताया, कुश्ती में अब बॉक्सिंग से भी ज्यादा चोटिल होने का खतरा है. क्योंकि बॉक्सिंग में आजकल टच के प्वाइंट हैं. अगर आप ध्यान से देखेंगे तो जो पहलवान विक्ट्री स्टैंड पर खडे़ होते हैं, अधिकतर के कहीं न कहीं चोट दिखाई देती है. लेकिन पहलवान इसका भी आनंद उठाते हैं क्योंकि यह कुश्ती का हिस्सा है.
सुशील ने इस साल अप्रैल में चीन के शहर तियुआन में वर्ल्ड क्वालिफाई टूर्नामेंट में 66 किलोग्राम भार वर्ग का गोल्ड मेडल जीत कर लंदन ओलंपिक का टिकट हासिल किया था.
कांस्य पदक का असर
"हमारा पूरा परिवार पहलवानों का है. मेरे दादा के बाद पिता व बडे़ भाई ने भी पहलवानी की. पिता गुरुओं के दंगल में जाया करते थे. गुरुजी का छत्रसाल स्टेडियम में अखाड़ा था. मेरे पिता मुझे वहां पर लेकर गए और इस तरह मैंने कुश्ती शुरू की"
सुशील
सुशील ने स्वीकार किया कि बीजिंग में उनके मेडल ने बड़ा असर डाला है.
सुशील ने कहा कि, आज छोटे-छोटे बच्चे कुश्ती में आ रहे हैं. बीजिंग में मेरे पदक के बाद देश में कुश्ती का जबरदस्त माहौल बना है. हाल ही में मैं अपने साथी योगेश्वर दत्त के गांव गया था. वहां पर एक बच्चा मुंह से बोल भी नहीं पाता था लेकिन उसने कुश्ती शुरू कर दी थी.
सुशील अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के पहलवान हैं.
वह बताते हैं, हमारा पूरा परिवार पहलवानों का है. मेरे दादा के बाद पिता व बडे़ भाई ने भी पहलवानी की. पिता गुरुओं के दंगल में जाया करते थे. गुरुजी का छत्रसाल स्टेडियम में अखाड़ा था. मेरे पिता मुझे वहां पर लेकर गए और इस तरह मैंने कुश्ती शुरू की.
भाई की कमी पूरी
हालांकि रोचक पहलू है कि सुशील के पूरे परिवार का ध्यान उनके बडे़ भाई को पहलवानी के एक बडे़ मुकाम पर ले जाना था. लेकिन चोटिल के कारण उन्हें कुश्ती छोड़नी पड़ी.
इस बारे में पूछे जाने पर सुशील ने बताया, मेरे भाई बहुत ही प्रतिभाशाली पहलवान थे. वह भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान रह चुके हैं. लेकिन घुटने की चोट के कारण उन्हें पहलवानी छोड़नी पड़ी. इसके बाद पूरे परिवार ने मुझ पर फोकस कर दिया.










