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बेटा ओलंपिक गोल्ड मेडल लेकर लौटना

 रविवार, 15 जुलाई, 2012 को 19:28 IST तक के समाचार

कमला देवी कहती हैं कि भगवान हर घर में सुशील कुमार जैसा बेटा दे

किसी भी मां के लिए अपने बच्चे को छोटी उम्र में अपने से दूर भेजना सबसे बड़ी कुर्बानी होती है. लेकिन पहलवान सुशील कुमार की मां कमला देवी के इस त्याग ने देश को ओलंपिक हीरो दिया.

बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक ने सुशील को सब कुछ दे दिया. अब कमला देवी चाहती है कि उनका बेटा देश के लिए लंदन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीते.

देश के लिए गोल्ड

"मेरा अपने बेटे से सिर्फ यही कहना है कि वह लंदन ओलंपिक के लिए अपनी तैयारी अच्छी तरह से करे. साथ में भगवान से भी दुआ करे. मैं चाहती हूं कि इस बार सुशील गोल्ड मेडल ले कर ही लौटे"

पहलवान सुशील कुमार का मां कमला देवी

बीबीसी के साथ बातचीत में कमला देवी ने कहा, “मेरा अपने बेटे से सिर्फ यही कहना है कि वह लंदन ओलंपिक के लिए अपनी तैयारी अच्छी तरह से करे. साथ में भगवान से भी दुआ करे. मैं चाहती हूं कि इस बार सुशील गोल्ड मेडल ले कर ही लौटे.”

सुशील कुमार 11 साल के थे जब मां उन्हें पहलवानी के हुनर सीखने के लिए दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम भेजने के लिए राजी हो गईं. तब से वह वहीं ट्रेनिंग कर रहे हैं.

कमला देवी बताती हैं, “सुशील और उसके ताउ के बेटे ने साथ में ही कुश्ती शुरू की थी. बचपन में भी दोनों एक दूसरे से कुश्ती करते थे. हम हमेशा ही कहते थे कि दो बच्चों के घर से बाहर भेजा है. इनमें से एक को तो बड़ा पहलवान बनना चाहिए. इसके भाई को अपने पिता की मौत के कारण बीच में ही कुश्ती छोड़नी पड़ी. ”

चैम्पियन की मां

जाहिर है कि बच्चे के बारे में मां से ज्यादा कोई दूसरा नहीं जानता. लेकिन कमला देवी को अपने बेटे की कामयाबी के आंकड़े शादी- ब्याह के गीतों की तरह याद है. सुशील पहली बार बड़ी कुश्ती कब जीता, कमला देवी को ऐसे याद है जैसे यह कल की ही बात है.

कमला देवी ने बताया, “सुशील को छत्रसाल स्टेडियम भेजे अभी 16 ही दिन हुए थे जब वह स्कूल नेशनल में कुश्ती में सेकेंड आया था. उसके बाद से वह लगातार मेडल जीत रहा है. मुझे सुशील के जीतने की खबर मुझे उसके पिता और बाकी लोगों से मिलती रहती है. सुशील के पिता सालों से उसके लिए दूध ले कर जा रहे हैं.”

सुशील उस परिवार से हैं जिसमें पहलवानी परंपरा है. उनके पिता भी अखाड़े में उतर चुके हैं. कुनबे के और कई भी सदस्य इस खेल में थे लेकिन कोई भी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा जिसे सुशील ने हासिल किया.

कमला देवी ने कहा, “सुशील बहुत ही सीधा और आदर्शवादी है. उसकी अच्छी आदत है कि वह सभी के पांव छूता है. उसने अपने गांव और देश में परिवार की जो शान बनाई है, वह मैं बता नहीं सकती. हर दिन कोई ने कोई बधाई देता है.”

काजू की बरफी, परांठे पसंद

कमला देवी बताती हैं कि सुशील को काजू की बर्फी और परांठे काफी पसंद है.

उन्होंने बताया, “उसे जो भी खाने को दे दो खा लेता है. उसके लिए खासतौर पर काजू की बर्फी बनाने के लिए हलवाई घर पर आता है.”

पहलवानी में चोट लगना आम बात है. सुशील कई बार चोटिल भी हुआ. मां होने के नाते कमला देवी की चिंता लाजिमी है. लेकिन उनका बेटा इस स्थिति को बखूबी संभालता है.

कमला देवी बताती हैं, “ एक बार बहादुरगढ़ में इंटरनेशनल कुश्ती के दौरान उसका होंठ कट गया था. सात टांके भी आए थे. लेकिन उसने खेलना बंद नहीं किया. मां के नाते दिल धड़कता था कि छोटा बच्चा है और इतनी चोट लगी है. मै जब उससे पूछती, तो वह प्यार से समझा देता है कि मां कुश्ती में चोट लगती ही रहती है ”

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