राष्ट्रीय दलों का परिचय
 
 
बसपा
 
 
 
 
 
बहुजन समाज पार्टी

बहुजन समाज पार्टी

 

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक राष्ट्रीय पार्टी है और इस समय ये पार्टी भारत में दलित नेतृत्व और सशक्तिकरण की पहचान बन चुकी है.

करिश्माई दलित नेता कांशीराम ने वर्ष 1984 में इस पार्टी का गठन किया था. फ़िलहाल उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इस पार्टी की अध्यक्ष हैं और उत्तर प्रदेश ही पार्टी का गढ़ है. पार्टी का चुनाव चिन्ह हाथी है.

चौदहवीं लोकसभा में इस पार्टी के 17 सांसद हैं जबकि उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में इस पार्टी के दो सौ से अधिक विधायक भी हैं. दस से अधिक राज्यों में इस पार्टी का कुछ न कुछ प्रभाव है.

कांशीराम ने पार्टी की स्थापना की

बहुजन समाज पार्टी का गठन समाज के दबे-कुचले लोगों (विशेषकर दलित) के हित और सत्ता में भागीदारी के मक़सद से किया गया था. पार्टी का दावा है बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के दर्शन उनकी प्रेरणास्त्रोत हैं.

पार्टी का जन्म कांशीराम के ज़रिए दलित सरकारी कर्मचारियों के हितों के लिए चलाए जा रहे एक ग़ैर-सरकारी संगठन की गोद से हुआ.

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कांशीराम ने दबे–कुचले लोगों का हाल जानने के पहले पूरे भारत का भ्रमण किया और फिर वर्ष 1978 में ‘बामसेफ़’ नामक एक अपना संगठन बनाया. उसके बाद उन्होंने बौद्ध रिसर्च सेंटर (बीआरसी) और फिर दलित-शोसित समाज संघर्ष समिति यानी ‘डीएस-4’ बनाया. आख़िर में ‘बहुजन समाज पार्टी’ (बीएसपी) नाम से एक राजनितिक पार्टी का गठन किया. पार्टी के पहले अध्यक्ष वे ख़ुद बने.

बहुजन समाज पार्टी पहली बार 1984 के लोकसभा चुनावों में उतरी लेकिन क़िस्मत की देवी मेहरबान नहीं रही. 1989 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के दो सदस्य चुनकर लोकसभा में गए और उसके बाद पार्टी को पिछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा.

मायावती दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की रणनीति अपना रही हैं

जब देश में गठबंधन की राजनीति ने अपना सिक्का जमाया तो बहुजन समाज पार्टी का भी रंग निखरा और वर्ष 1995 आते-आते ये पार्टी भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ता के शिखर तक पहुंच गई और पार्टी ने गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया.

उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने इसे ‘लोकतत्र का चमत्कार’ कहा था.

13वीं लोकसभा में इस पार्टी के 14 लोकसभा सदस्य चुने गए. पार्टी ने वर्ष 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया और 13 विधायक चुने गए, लेकिन जब वर्ष 1991 में चुनाव हुए तो पार्टी की सीट घटकर 12 हो गई.

लेकिन उसके बाद पार्टी की सीटों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है. वर्ष 1993 और 1996 में दोनों बार 67 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे, तो 2002 में 98 और 2007 में 206 विधायक चुन कर आए. इस बीच पार्टी ने तीन बार राज्य में गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया. जबकि 2007 में पूर्ण बहुमत से सरकार का गठन किया.

सोशल इंजीनियरिंग

इस पार्टी की पहचान एक दलित पार्टी के तौर पर होती है लेकिन पार्टी अध्यक्ष मायावती परोक्ष रूप से ये घोषणा कर चुकी हैं कि वो दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए कुछ भी कर सकती हैं.

संभवत: यही वजह है कि पार्टी ने अपनी रणनीति में ख़ासा बदलाव कर लिया है और कभी उच्च जातियों के ख़िलाफ़ कड़ा तेवर रखने वाली पार्टी अब ब्राह्मणों के क़रीब है.

ब्राह्मणों को एकजुट करने में सतीश चंद्र मिश्र की मुख्य भूमिका मानी जाती है

पंद्रहवीं लोकसभा चुनावों में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदलवार उतारे हैं और सबसे अधिक टिकट दलित के बजाय ब्राह्मणों को दिए हैं.

उत्तर प्रदेश में सत्ता का सुख पाने के बाद पार्टी की अध्यक्ष मायावती की नज़र अब दिल्ली की कुर्सी पर है. 90 के दशक के बाद देश में जिस तरह से गठबंधन की राजनीति का दौर चला है, टीकाकारों की राय में ये कोई नामुमकिन सपना नहीं है.

पार्टी का सफ़र भी विवादों से घिरा रहा है. पार्टी पर भ्रष्टाचार और महात्मा गांधी को अपशब्द कहने के आरोप लगते रहे है. हालांकि पार्टी की अध्यक्ष मायावती अपने अक्खड़पन और बिंदास छवि के लिए जानी जाती हैं.
 
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