भारतीय अर्थव्यवस्था
 
 
 
 
 
 
 
उम्मीद की किरण
 
 
 
भारतीय अर्थव्यवस्था - 2008

बची है उम्मीदें

 

विश्लेषकों और सरकार का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मज़बूती और ख़ास कर वित्तीय क्षेत्र में कड़े नियमों के कारण भारत पर आर्थिक संकट का गंभीर असर नहीं पड़ेगा.

कारण साफ हैं, भारत में बैंकों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों में शत प्रतिशत विदेशी निवेश नहीं है और हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की एक निश्चित सीमा निर्धारित है.

साथ ही धीरे-धीरे विश्व बाज़ार से जुड़ने की भारतीय नीति भी कारगर साबित हो रही है. यहाँ रूपया पूर्ण परिवर्तनीय नहीं है. मतलब कोई भी विदेशी निवेशक भारत में अपनी संपत्ति को डॉलर में बदलकर रातोरात यहाँ से पैसा अपने देश में हस्तांतरित नहीं कर सकता.

तेल में गिरावट

मंदी के दौर में कच्चे तेल की क़ीमतों का घटना भारत को राहत पहुँचाने वाला है क्योंकि भारतीय आयात का लगभग एक तिहाई हिस्सा तेल पर ही खर्च हो जाता है.

तेल बाज़ार का हाल

इस वर्ष कच्चा तेल एक समय 147 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया था लेकिन अब यह 35 डॉलर के आस-पास गिर गया है.

भारत इसका फ़ायदा उठा सकता है.

साथ भारतीय बैंकों की हालत दुरुस्त है और सरकार का कहना है कि उनके पास पर्याप्त नकदी मौजूद है. रिजर्व बैंक धीरे-धीरे नियमों में ढील देकर ये नकदी आम उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है.
 
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