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![]() ख़तरे में नौकरी वैश्विक मंदी के असर से भारत का अछूता रहना मुमकिन नहीं है क्योंकि ख़ासकर नब्बे के दशक के बाद उदारीकरण के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था शेष दुनिया से सीधे जुड़ चुकी है.
अमरीका, यूरोप और जापान में नकारात्मक विकास दर और माँग में भारी कमी के कारण कंपनियों की ख़स्ताहाली का असर भारत पर भी पड़ा है. सिटी ग्रुप, स्टैंडर्ड चार्टर्ड, एआईजी जैसी कंपनियाँ भारत में भी कारोबार करती हैं जिनमें हज़ारों भारतीयों को रोज़गार मिला हुआ है. ऐसी आशंका थी ये कंपनियाँ भारत में भी कर्मचारियों की संख्या घटा सकती है लेकिन अभी तक ऐसा हुआ नहीं है. नौकरियों पर मँडराता संकट दरअसल मंदी के कारण ये कंपनियाँ अपने गृह देश में रोज़गार घटा रही हैं लेकिन कामकाज के लिहाज़ से उन्हें भारत इतना सस्ता दिखाई दे रहा है कि वे नौकरियाँ घटाने की नहीं सोच रहे हैं. लेकिन कुछ ऐसे सेक्टर हैं जहाँ इस तरह की गतिविधि देखी जा सकती है. शुरुआत जेट एयरवेज़ के बड़े फ़ैसले से हुई जिसमें 1900 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया लेकिन भारी दबाव में कंपनी ने ये फ़ैसला वापस ले लिया. बावजूद इसके इन कर्मचारियों के वेतन घटा दिए गए. भारत में एयरलाइन कंपनियों को पहले ऊँची तेल कीमतों और अब घटते यात्रियों के कारण घाटा सहना पड़ रहा है. रीयल स्टेट और बीपीओ इसके अलावा रोज़गार पर सबसे ज़्यादा असर रीयल स्टेट कंपनियों में हुआ है. ऊँची ब्याज दर और तत्काल कर्ज़ लेकर घर ख़रीदने से बचने की प्रवृत्ति के कारण डीएलएफ़, यूनीटेक, ओमैक्स जैसी कंपनियों ने अपने बड़े प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में डाल दिए हैं और वहाँ काम करने वाले लोगों की छंटनी हो रही है या वेतन घटाए जा रहे हैं. टाटा स्टील ने जमशेदपुर में सैंकड़ों प्रशिक्षु कर्मचारियों की छंटनी की है. ज़्यादा असर निर्यात आधारित कंपनियों पर है क्योंकि विदेशों में उनके सामानों की माँग काफी घट चुकी है. अमरीका, यूरोप के विकास में अहम भूमिका अदा कर रही भारत स्थित बीपीओ कंपनियों का कारोबार घट गया है. बीपीओ उद्योग संघ ने ये कहकर सनसनी फैला दी है कि वर्ष 2009 की पहली तिमाही में लगभग ढाई लाख लोगों को रोज़ागर से वंचित होना पड़ेगा. हालाँकि नैस्कॉम ने इस आशंका को ख़ारिज़ करते हुए कहा है कि जैसे ही विश्व अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी दुनिया भर की कंपनियाँ भारतीय बीपीओ कंपनियों की ओर रुख़ करेंगी. |
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