एड्स: क्यों और कैसे
 
 
 
 
एड्स का विकास
 
 
 
एड्स का बढ़ना

एड्स का बढ़ना

 

जैसे जैसे प्रतिरोध प्रणाली क्षतिग्रस्त होती जाती है, रोग से लड़ने की उसकी क्षमता भी कम होती जाती है और इस तरह होने वाले संक्रमण घातक हो सकते हैं.
एचआईवी ग्रस्त लोगों को टीबी, मलेरिया और निमोनिया जैसी बीमारियाँ होने की आशंका काफ़ी होती है. जैसे-जैसे सीडीफ़ोरप्लस कोशिका की संख्या कम होती जाती है वैसे-वैसे रोग का शिकार होने की आशंका बढ़ती जाती है.
फिर एचआईवी के रोगी साधारण जीवाणुओं या बैक्टीरिया की वजह से होने वाले संक्रमणों के शिकार होते जाते हैं. आम तौर पर स्वस्थ शरीर उससे संघर्ष कर सकते हैं मगर रोगी शरीर के लिए ऐसा संभव नहीं हो पाता. आम तौर पर सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की संख्या जैसे ही 200 से नीचे पहुँचती है व्यक्ति एड्स का शिकार हो जाता है.
अगर चिकित्सा संबंधी पूरी सावधानी बरती जाए तो रोगियों को इनमें से कुछ रोगों के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार किया जा सकता है. वैसे कुछ अवसरों पर ये दवाएँ महँगी हो सकती हैं और इनके कुछ साइड एफ़ेक्ट्स भी दिख सकते हैं.
थ्रश ऐंड हर्प्स
थ्रश या कैंडिडायेसिस एक तरह का संक्रमण है जो मुँह, गले या योनि पर असर डालता है.इसी तरह हर्प्स सिंप्लेक्स वायरस से गले की या यौन अंगों की परेशानियाँ सामने आ सकती हैं. दोनों ही तरह के संक्रमण आम हैं मगर ये एचआईवी से प्रभावित लोगों पर अधिक असर डालता है. वैसे जिन लोगों में सीडीफ़ोरप्लस कोशिका की संख्या अधिक हो वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं.
लक्षण-

 
थ्रश की वजह से सूजन, मुँह का सूखना और कुछ भी निगलने में दिक़्क़त जैसी परेशानियाँ सामने आती हैं. हर्प्स की वजह से दर्दनाक छाले पड़ जाते हैं.

क्षयरोग या टीबी
दुनिया भर में एड्स की वजह से होने वाली मौतों में टीबी का भी बड़ा हाथ है क्योंकि कुछ देशों में तो एड्स के साथ ही टीबी भी एक महामारी के जैसे फैला है. ये विषाणु या बैक्टीरिया के ज़रिए होता है और कई लोगों के ज़रिए एक जगह से दूसरे जगह पहुँच जाता है मगर इससे बीमारी तो कुछ ही लोगों को होती है. वैसे जिन लोगों में एचआईवी के वायरस हों उनमें टीबी के बढ़ने की संभावना आम लोगों के मुक़ाबले 30 गुना ज़्यादा होती है. टीबी पहले तो फेफड़ों पर हमला करता है मगर बाद में दिमाग़ तक पहुँच सकता है.
लक्षण-

 
बुरी तरह खाँसी और कफ़, सीने में दर्द, बलगम के साथ ख़ून आना, थकावट, वजन कम होना, बुख़ार और रात में पसीना आना.

प्रतिरक्षा प्रणाली का कैंसर
एचआईवी से ग्रस्त लोगों में प्रतिरक्षा प्रणाली का कैंसर या नॉन हॉजकिन्स लिंफ़ोमास एनएचएल होने का ख़तरा काफ़ी रहता है. एनएचएल शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है. इसमें रीढ़ से लेकर दिमाग़ तक शामिल है जो एक वर्ष के भीतर ही जानलेवा हो सकता है. ये सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की कितनी भी संख्या रहते हो सकता है.
लक्षण-

 
बुख़ार, रात में पसीना आना और वज़न में कमी

सीडीफ़ोर प्लस सेल की संख्या 250 से कम
घातक घाव

 
कैपोसीज़ सार्कोमा एचआईवी ग्रस्त लोगों में पाई जाने वाली कैंसर जैसी आम बीमारी है. इसकी वजह से त्वचा पर लाल या बैंगनी रंग के घाव हो जाते हैं. ये मुँह के साथ ही फेफड़ों पर भी असर डालता है जो कि घातक हो सकता है. ये उन लोगों पर असर डालता है जिनमें सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की संख्या 250 से कम हो मगर उससे भी कम संख्या वालों के लिए ये और भी घातक सिद्ध हो सकता है.
लक्षण-

 
घाव, अगर फेफड़ों में हो तो साँस फूलना

सीडीफ़ोर प्लस सेल की संख्या 200 से कम
निमोनिया

 
इसका असर फेफड़ों पर होता है. न्यूमोसिस्टिस न्यूमोनिया या पीसीपी एक ऐसा संक्रमण है जिसकी वजह से निमोनिया होता है. ये आम तौर पर फेफड़ों को निशाना बनाते हैं मगर ये यकृत यानी लिवर या बोन मैरो पर भी असर डाल सकते हैं. एचआईवी रोगियों की ये काफ़ी समय से जान लेता रहा है, मगर अब दवाओं और उपचार के ज़रिए इससे बचा जा सकता है.ये आम तौर पर उन लोगों को होता है जिनमें सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की संख्या 200 से कम होती है.
लक्षण-

 
बुख़ार, सूखी खाँसी, सीने में दर्द और साँस लेने में परेशानी

सीडीफ़ोर प्लस सेल की संख्या 100से कम
दिमाग़ से जुड़े संक्रमण

 
एचआईवी के रोगी आम तौर पर दिमाग़ पर असर डालने वाले दो संक्रमणों के शिकार आसानी से हो जाते हैं. टॉक्सोप्लाज़्मोसिस जानवरों में पाए जाने वाले एक परजीवी यानी पैरासाइट की वजह से होता है और इससे दिमाग़ में घाव हो सकता है. क्रिप्टोकॉकस मिट्टी में पाया जाने वाला एक फ़ंगस या कवक है जिसकी वजह से मेनिन्जाइटिस होता है और ये दिमाग़ पर असर डालने के साथ ही व्यक्ति को कोमा या मौत की ओर भेज सकता है. ये संक्रमण उन लोगों में आम हैं जहाँ सीडीफ़ोरफ्लस की संख्या 100 से भी कम हो जाए.
लक्षण-

 
सिरदर्द, बुख़ार, देखने में समस्या, घुटन और उल्टी, शरीर के एक हिस्से में कमज़ोरी, बोलने और चलने में कठिनाई, गर्दन अकड़ जाना

सीडीफ़ोर प्लस सेल की संख्या 75 से कम
आँतों में संक्रमण

 
माइकोबैक्टीरियम एवियम कॉम्प्लेक्स या एमएसी पानी, धूल और मिट्टी में पाए जाने वाले एक जीवाणु या बैक्टीरिया की वजह से ये संक्रमण होता है. ये आँत के हिस्सों पर आक्रमण करता है और इसके बाद पूरे ख़ून और शरीर को प्रभावित करता है. एमएसी होने की संभावना उन लोगों में सबसे ज़्यादा होती है जिनमें सीडीफ़ोरप्लस कोशिका की संख्या 75 से कम हो.
लक्षण-

 
पेट दर्द, उल्टी, बुख़ार, रात में पसीना आना, भूख नहीं लगना, वज़न कम होना, थकावट महसूस करना और दस्त

सीडीफ़ोर प्लस सेल की संख्या 50 से कम होने पर
इससे अंधेपन का ख़तरा हो जाता है. साइटोमेगालोवायरस एक ऐसा संक्रमण है जो विषाणु या वायरस की वजह से होता है. एचआईवी रोगियों में ये अधिकतर रेटिनाइटिस की वजह बनता है यानी आँख की रेटिना की कोशिकाएँ नष्ट होने लगती हैं. अगर इसका इलाज नहीं किया जाए तो इससे अंधे होने का ख़तरा काफी हो जाता है. सीएमवी का इलाज दवाओं से हो सकता है.ये वायरस शरीर के अन्य हिस्सों पर भी असर डाल सकता है. ये उन लोगों पर शायद ही असर डालता है जिनके शरीर में सीडीफ़ोरप्लस कोशिकाओं की संख्या 100 से अधिक हो जबकि जिनमें ये संख्या 50 से कम हो वे इसका शिकार आम तौर पर हो सकते हैं.
लक्षण-

 
देखने में दिक़्क़त
 
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