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![]() ओलंपिक में भारतीय
बीजिंग ओलंपिक भव्य और चकाचौंध वाला रहा ही लेकिन भारत के लिए भी ये ओलंपिक अब तक का सबसे सफल ओलंपिक साबित हुआ. भारतीय हॉकी टीम भले ही ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई नहीं कर पाई और टेनिस में भी सानिया, पेस और भूपति कोई कमाल नहीं दिखा पाए. लेकिन अभिनव बिंद्रा, सुशील कुमार और विजेंदर सिंह ने भारत का नाम रौशन किया. अभिनव बिंद्रा भारत के शूटिंग स्टार अभिनव बिंद्रा ने वर्ष 2008 के बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा. उन्होंने 10 मीटर एयर राइफ़ल में स्वर्ण पदक हासिल किया. उन्होंने यह करिश्मा कर ओलंपिक के 112 वर्षों के इतिहास में पहली बार भारत की ओर से किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया. भारत ने 1980 के बाद पहला स्वर्ण पदक जीता है. इसके पहले भारत हॉकी में स्वर्ण पदक जीता था.
देहरादून में पैदा हुए और चंडीगढ़ में पले बढ़े अभिनव बिंद्रा वर्ष 2000 में सिडनी ओलंपिक में हिस्सा लेने वाले सबसे कम उम्र के भारतीय भी बने. उनका जन्म 28 सितंबर, 1982 को हुआ था. उन्होंने 2001 में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में छह स्वर्ण पदक हासिल किए थे जबकि 2002 में मैनचेस्टर में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने युगल प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण और व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में रजत पदक हासिल किया था. सन 2004 के ओलंपिक में उन्होंने ओलंपिक का रिकॉर्ड तो तोड़ा था लेकिन वे कोई मेडल लेने से चूक गए थे. पाँच फ़ुट आठ इंच लंबाई वाले अभिनव को 2001 में अर्जुन पुरस्कार और 2001-2002 में राजीव गांधी खेल रत्न मिला था. 28 सालों के बाद भारत के लिए स्वर्ण लेकर प्रतिष्ठा दिलाने वाले अभिनव बिंद्रा की प्रतिभा को सबसे पहले लेफ़्टिनेंट जनरल जेएस ढिल्लन ने पहचाना. वे ही अभिनव के पहले कोच थे. अभिनव खिलाड़ी होने के साथ साथ एक उद्यमी भी हैं. अभिनव फ्यूचरिस्टिक नाम की कंपनी के सीईओ है. निशानेबाज़ अभिनव को एयर राइफ़ल के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल है. एक शूटर होने के अलावा 23 वर्षीय अभिनव ने एमबीए की डिग्री भी हासिल की है जो उनके दूसरे व्यवसाय में उनकी सहायक है. विजेंदर सिंह भारत के विजेंदर सिंह ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज़ बने. बीजिंग ओलंपिक में वे सेमी फ़ाइनल मुक़ाबला क्यूबा के एमिलियो कोरिया से हार गए और उन्हें कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा.
29 अक्तूबर 1985 को जन्मे विजेंदर हरियाणा के रहने वाले हैं. काफ़ी कम उम्र से ही उन्हें मुक्केबाज़ी का शौक था और वे अभ्यास के लिए भिवानी के भारतीय खेल प्राधिकरण सेंटर जाते थे. बाद में उन्होंने क्यूबा जाकर भी ट्रेनिंग ली. वर्ष 2004 के एथेंस ओलंपिक में भी विजेंदर ने हिस्सा लिया था लेकिन वे हार गए थे. वर्ष 2006 का राष्ट्रमंडल खेल विजेंदर के लिए पहली अंतरराष्ट्रीय स्तर की सफलता लेकर आया. विजेंदर फ़ाइनल में हार गए और उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा. बीजिंग ओलंपिक में तो वे फ़ाइनल तक नहीं पहुँच पाए और सेमी फ़ाइनल में ही उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा. लेकिन कांस्य पदक तो उन्हें मिल ही गया. सुशील कुमार बीजिंग ओलंपिक में सुशील कुमार तीसरे ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्हें कोई पदक मिला. पहलवान सुशील कुमार ने कांस्य पदक हासिल किया. दिल्ली के नजफ़गढ़ के रहने वाले सुशील कुमार दूसरे भारतीय पहलवान हैं, जिन्हें ओलंपिक में कांस्य पदक मिला है. इससे पहले 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में केडी जाधव ने कांस्य पदक जीतने में सफलता पाई थी.
सुशील कुमार के पिताजी बस ड्राइवर थे. लेकिन पहलवानी के क्षेत्र में सुशील को आगे लाने में उनका बड़ा योगदान रहा. सुशील कुमार के चचेरे भाई संदीप ने भी उन्हें काफ़ी बढ़ावा दिया. परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी इसलिए संदीप ने ख़ुद पहलवानी छोड़ अपने भाई को आगे आने का मौक़ा दिया. चौदह साल की उम्र से ही सुशील कुमार छत्रसाल स्टेडियम के अखाड़े में जाकर पहलवानी करते थे. सुशील कुमार को पहले तो यशवीर और रामपाल ने ट्रेनिंग दी. फिर अर्जुन पुरस्कार जीतने वाले सतपाल ने भी सुशील को पहलवानी के गुर सिखाए. रेलवे कैंप में उन्हें कोच ज्ञान सिंह ने शिक्षा दी. सुशील को पहली सफलता 1998 में मिली जब वर्ल्ड कैडेट गेम्स में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता. वर्ष 2000 में उन्होंने एशियाई जूनियर कुश्ती चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीता. वर्ष 2003 में एशियाई सीनियर चैम्पियनशिप में उन्होंने कांस्य जीतने में सफलता पाई. राष्ट्रमंडल कुश्ती चैम्पियनशिप में भी उन्होंने गोल्ड जीता लेकिन मीडिया में इसका ज़्यादा जिक्र नहीं हुआ. वर्ष 2003 में ही वर्ल्ड चैम्पियनशिप में उन्हें चौथा स्थान हासिल हुआ. लेकिन 2004 के एथेंस ओलंपिक में उन्होंने बहुत ख़राब प्रदर्शन किया. 2006 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार मिला और फिर बीजिंग ओलंपिक में उन्होंने कांस्य पदक जीतने में सफलता पाई. |
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