कला जगत-2008
 
रंगमंच
 

रंगमंच
विजय तेंदुलकर और जयदेव हतंगड़ी
 

रंगमंच

 

भारत और दक्षिण एशिया के लिए वर्ष 2008 विशेष महत्व का रहा. पर इसकी चर्चा से पहले दो लोगों के योगदान की चर्चा और अब उनकी अनुपस्थिति में श्रद्धांजलि देते चलें.

पहला नाम आता है भारतीय रंगमंच के जाने-माने निर्देशक, नाट्यकर्मी विजय तेंदुलकर का. तेंदुलकर इस वर्ष रंगमंच और दुनिया को अलविदा कह गए. थिएटर ही नहीं, सिनेमा और छोटे पर्दे के विकास और गतिविधियों में भी तेंदुलकर का प्रत्यक्ष-परोक्ष योगदान रहा है.

'शांताता! कोर्ट चालू आहे', 'घासीराम कोतवाल' और 'सखाराम बाइंडर' उनके लिखे बहुचर्चित नाटक हैं. उनकी लिखी पटकथा वाली कई कलात्मक फ़िल्मों ने समीक्षकों पर गहरी छाप छोड़ी. इन फ़िल्मों में 'अर्द्धसत्य', 'निशांत', 'आक्रोश' शामिल हैं. तेंदुलकर को मराठी और हिंदी में अपने लेखन के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार जैसे सम्मान भी मिले.

पढ़िए रिपोर्ट- अलविदा कह गए विजय तेंदुलकर

दूसरा अहम नाम है जयदेव हतंगड़ी का. जयदेव हतंगड़ी ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अपने नाट्यकर्मी के तौर पर सफ़र की औपचारिक शुरुआत की थी. उनके इस सफ़र में उनके साथ थीं उनकी पत्नी, रोहिणी हतंगड़ी जिन्हें थिएटर और फ़िल्मों में एक मज़बूत और प्रभावी योगदान के लिए जाना जाता है. अर्थ, सारांश और गांधी जैसी फ़िल्मों में रोहिणी ने काम किया था.

वो अभिनय और निर्देशक के क्षेत्र में स्थापित हुए, गुजराती, अंग्रेज़ी, हिंदी और मराठी उनके संचार की भाषाएं बनीं. पुणे और मुंबई कर्मभूमि बने. 70 के दशक के प्रसिद्ध छबीलदास रंगमंच आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए जयदेव सदा याद किए जाएंगे.

एनएसडी के 50 वर्ष

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने इस वर्ष अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए.

इस मौके पर जहाँ एक ओर इससे निकली रंगमंच की पीढ़ियों के योगदान की चर्चा और प्रशंसा हुई वहीं संस्थान में नौकरशाही के बोलबाले और गुणवत्ता के गिरते स्तर जैसे मुद्दों की कहीं दबे तो कहीं मुखर होकर आलोचना भी सुनने को मिली.

इसी वर्ष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से होने वाले वार्षिक अंतरराष्ट्रीय भारत रंग महोत्सव को भी 10 वर्ष पूरे हुए.

पर केवल एनएसडी के चश्मे से देखते हुए आयोजित हुआ यह महोत्सव भी विवादों में घिरा.

सरहदों से पार...

सबसे पहले बात दक्षिण एशिया में थिएटर के अस्तित्व से जुड़े एक नए अध्याय की. तालेबान शासन के दौरान थिएटर अफ़ग़ानिस्तान में प्रतिबंधित था. इससे वहाँ रंगमंच की परंपरा को बहुत नुकसान हुआ.

रंगमंच
अफ़ग़ानिस्तान में रंगमंच का काम लगभग दो दशक से बंद था

रंगमंच से दूर हो चले अफ़ग़ानिस्तान से इसबार पहली बार ऐसा प्रोडक्शन शुरू हुआ जो पूरी तरह से वहीं के रंगकर्मियों द्वारा किया गया. इतना ही नहीं, ये काम भारत भी पहुँचा और यहाँ लोगों को अफ़ग़ानिस्तान के दो नाटक देखने को मिले.

अब एक किस्सा... 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि पर त्रिपुरारी शर्मा द्वारा निर्देशित एक नाटक, अजीजन पिछले दिनों पाकिस्तान गया. इस नाटक के शो के दौरान लाहौर में उसी जगह पर धमाका हुआ जहां इस नाटक का मंचन चल रहा था.

कई चिंताओं, आशंकाओं के बीच धमाके के दूसरे दिन इस नाटक को दोबारा प्रदर्शित करने का फ़ैसला लिया गया. लोग आए और टिकट लेकर नाटक देखा. आयोजकों के मुताबिक शो हाउसफ़ुल था. सरहद पार कला और रंगमंच के प्रति यह अनुराग और अनुकूल माहौल अच्छे औऱ सकारात्मक संकेत देता है.
^^ पिछले लेख पर वापस जाएँ बीबीसी हिंदी