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![]() कला जगत-2008 हिंदी के एक प्रतिष्ठित कवि, शिवबहादुर सिंह भदौरिया की कविता की एक पंक्ति है-
'राह ताकते किसी की आज भी, एक सांझ और ढल गई..' एक पूरा वर्ष तरह तरह के बिंब खींचता, कई उतार चढ़ाव दिखाता, कुछ नया पाता और कुछ संजोया हुआ खोता... ढल चुका है. 2008 अब इतिहास है. इसी इतिहास का एक पृष्ठ कला संस्कृति के अनेक कहे-अनकहे संदर्भों को भी समेटे, संजोए हुए है. दुनियाभर में साहित्य संस्कृति के क्षेत्र को जहाँ इस वर्ष बहुत कुछ योगदान के तौर पर मिला है, कई लोगों के काम को पहचाना गया है, सम्मान मिला है, वहीं कुछ वरिष्ठ, स्थापित हस्तियों ने दुनिया और कला जगत को अलविदा भी कहा है. कई राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैश्विक संदर्भों पर प्रमुखता से बात करता यह वर्ष ऐसी कुछ बातों को याद कर सका तो कुछ बातें बड़े, मुख्यधारा के सवालों के बीच खो गईं. पर इससे इनकी अहमियत या असर को कमतर नहीं आंका जा सकता है. इस प्रस्तुति में बातचीत होगी वर्ष 2008 के दौरान देश और दुनिया में कला, संगीत, साहित्य, रंगमंच, और अन्य सांस्कृतिक घटनाओं, गतिविधियों की. प्रस्तुतिः बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद |
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