आर्थिक संकट
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 


 
आर्थिक संकट


अमरीका चुनाव, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, थाईलैंड, रुस-जॉर्जिया, ज़िम्बाब्वे, चीन-तिब्बत विवाद...ये सब के सब ऐसे मसले हैं जो किसी न किसी रूप में 2008 में चर्चा में रहे. अपनी अपनी अहमियत के हिसाब से इन मुद्दों का अलग-अलग असर हुआ.

आर्थिक संकट पर विशेष

लेकिन इन सब से अलग एक मुद्दा ऐसा रहा जिसने पूरे विश्व को एक साथ प्रभावित किया और वो है विश्व में छाया आर्थिक संकट. इस एक समस्या के आगे बाक़ी सारे मुद्दे कुछ हद तक गौण हो गए.
क्या अमरीका, क्या यूरोपीय अर्थव्यवस्था और क्या भारत-चीन जैसे देश सब के सब किसी न किसी हद तक इस संकट की चपेट में है. देखते ही देखते बड़े-बड़े बैंक दिवालिया हो गए.

निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स ने ख़ुद को दिवालिया घोषित कर दिया. अमरीका में ब्याज दर एक फ़ीसदी से घटकर शून्य से 0.25 फ़ीसदी हो गई है. 1930 की आर्थिक मंदी के समय भी ब्याज दरें कभी इतनी कम नहीं थीं जितनी कि अब की गईं हैं.

कई देशों को अपने यहाँ बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी. ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए 20 अरब पाउंड के पैकेज की घोषणा की गई तो अमरीका को भी आर्थिक पैकेज घोषित करना पड़ा. भारत सरकार ने भी विश्वव्यापी मंदी के मद्देनज़र आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की.

वित्तीय सूनामी



अमरीकी फ़ेडरल रिज़र्व के पूर्व चेयरमैन एलन ग्रीनस्पैन ने मौजूदा वित्तीय संकट को सूनामी करार दिया है. इस दौरान विश्व भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिरे. कई शेयर बाज़ारों में तो हालत इतनी बिगड़ी कि शेयरों की ख़रीद-बिक्री अस्थाई तौर पर बंद करनी पड़ी. कंपनियों में नौकरियों की छटनी का क्रम जारी है. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की कोशिशों और अरबों डॉलर के वित्तीय पैकेज के बावजूद अर्थव्यवस्था संभल नहीं पा रही है.

दिलचस्प बात ये है कि इस साल के शुरु में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर हाहाकार मची हुई थी लेकिन वैश्विक मंदी के कारण माँग में कमी आने की आशंका के बीच अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल का दाम फिसला है. कच्चे तेल की कीमत पिछले साढ़े तीन वर्षों के सबसे कम स्तर पर पहुँच गई थी यानी करीब 46 डॉलर प्रति बैरल. जुलाई में तेल का भाव 147 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया था और उसके बाद से अब तक इसमें लगभग दो तिहाई की कमी आ चुकी है.

विशलेषकों का कहना है कि कम से कम 2009 की पहली तिमाही तक तो अर्थव्यवस्था में सुधार की बहुत ज़्यादा गुंजाइश नज़र नहीं आती और आगे भी क़दम फूँक फूँक कर रखना होगा. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ के अध्यक्ष का कहना है कि वैश्विक स्तर पर आर्थिक विकास को गति देने के लिए सरकारों को अधिक से अधिक पैसे लगाना होगा. उनके मुताबिक 2009 बहुत ही बुरा साल साबित होगा.
 
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