सर्न महाप्रयोग
 
 


 
महाप्रयोग

ब्रह्मांड की रचना कैसे हुई.. सदियों से मनुष्य ब्रह्मांड से जुड़े रहस्यों की तह तक पहुँचने की कोशिश करता आया है. इस दिशा में वैज्ञानिकों ने वर्ष 2008 में एक बड़ा क़दम उठाया.

तीन दशक की तैयारियों के बाद फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड की सीमा पर दुनिया का सबसे बड़ा वैज्ञानिक परीक्षण सिंतबर में शुरु हुआ जिसका मकसद है ब्रह्मांड की रचना को समझना. 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में अणुओं को छोड़ा गया. इसके लिए बाईं से दाईं ओर घूमने वाले कण को पहले छोड़ा गया जिसने 27 किलोमीटर का चक्कर सफलतापूर्वक पूरा कर लिया जिसके बाद दाएँ से बाएँ घूमने वाले कण को छोड़ा गया और उसने भी अपना चक्कर पूरा किया.. इस महाप्रयोग से मिलने वाली जानकारी से पृथ्वी की उत्पत्ति की 'बिग बैंग' थ्योरी को समझने में मदद मिलेगी.

महाप्रयोग से जुड़े सवालों के जवाब

लार्ज हैडरॉन कोलाइडर का निर्माण भूमिगत किया गया है क्योंकि ज़मीन के ऊपर बनाने पर ख़र्चा कई गुना ज़्यादा आता. साथ ही पैदा होने वाले विकिरणों को नियंत्रित करना ज़्यादा आसान रहता है.

सर्न की महामशीन के वृताकार सुरंग में बहाई जाने वाली प्रोटॉन धारा में हर प्रोटॉन कण की ऊर्जा सात टेट्रा-इलेक्ट्रॉनवोल्ट होगी जो टक्कर के समय दुगुनी मात्रा में पहुँच जाएगी यानि 14 टेट्रा-इलेक्ट्रॉनवोल्ट. यदि आम जीवन में हम लोगों द्वारा प्रयुक्त ऊर्जा की मात्रा से तुलना करें तो ये मात्रा कुछ भी नहीं है. विशेष बात सिर्फ़ ये है कि टक्कर की ऊर्जा बहुत ही छोटे से बिंदु पर केंद्रित होगी.


दरअसल मनुष्य अपने ब्रह्मांड के बारे में बहुत कम जानता है. खगोल विज्ञानियों का कहना है कि ब्रह्मांड जिन चीज़ों से बना है उनमें से सिर्फ़ चार प्रतिशत की पहचान हो सकी है, बाक़ी 96 प्रतिशत क्या है, यह किसी को नहीं पता. इसी रहस्य की खोज में ये महाप्रयोग मदद करेगा.इस परियोजना पर कुल दस अरब डॉलर ख़र्च किए गए हैं. भारत ने भी तकनीकी और आर्थिक स्तर पर इसमें योगदान दिया है. कई भारतीय वैज्ञानिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्तर पर इस प्रयोग से जुड़े हुए हैं.

हालांकि सिंतबर के अंत में महाप्रयोग में इस्तेमाल हो रहा लार्ज हेड्रोन कोलाइडर खराब हो गया जिसके बाद से काम ठप्प पड़ा है. सर्न ने बताया कि इसे ठीक करने में करीब दो करोड़ डॉलर का खर्चा आएगा और काम दोबारा 2009 में गर्मियों तक शुरु हो पाएगा.

 
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