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![]() कश्मीर पर बात हो, मगर हो पते की - अग्नि शेखर, संस्थापक पनुन कश्मीर
कश्मीर समस्या का एक पेचीदा पहलू यह भी है कि इस मामले से जुड़े विवाद, उसके किरदार और उसके समाधान के लिए कभी एक राय नहीं बन सकी है. इस समस्या को देखने, समझने और हल करने के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं जो ख़ुद एक दूसरे के इस क़दर विपरीत हैं कि आदमी आख़िरकार अपने हाथ खड़े कर देता है. इसीलिए प्रारंभ से ही कश्मीर अविश्वस्नीय, असुरक्षा, ख़ौफ़ और चिंता का दूसरा नाम रहा है. भारत के साथ उसकी एकता को अस्थायी कहा गया और कभी उसके भविष्य और नसीब के साथ भावनात्मक नारे जोड़कर उसके साथ राजनीति की गई.
यूँ देखा जाए तो मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग और दो-राष्ट्रों की विचारधारा के मानने वालों का एक ख़ास वर्ग कश्मीर में रहा है. लेकिन महाराजा हरि सिंह के ख़िलाफ़ जनआंदोलन का बिगुल बजाने वाले नेता मोहम्मद शेख़ अब्दुल्ला और उनकी नेशनल कॉन्फ़्रेंस न बढ़ सकी. यह अलग बात है कि कश्मीर को भारत में शामिल करने वाले और बाद में इसे ‘संविधान सभा’ में मंज़ूरी दिलाने वाले राजनेताओं ने भी लोगों को गुमराह किया. सारे दावे और विवोदों के बावजूद भारत के शासक दलों ने कश्मीर के मामले में कोई स्पष्ट नीति नहीं अपनाई. कश्मीर को देश का मज़बूत भाग कहने के पीछे शासक दलों का कमज़ोर और ख़ाली दिल साफ़ झलकता है. इसीलिए रातों-रात केंद्र सरकार और कश्मीर की जनता के बीच ‘बफ़र’ के नाम पर ‘बिचौलियों’ की चांदी हो गई. ‘बफ़र’ की राजनीति या दलाली करने वालों ने अपने दोग़लेपन और धन लूटने की आदत पर पर्दा डालने के लिए पृथकतावादी और धार्मिक कट्टरवादियों और चरमपंथियों को चोरी छुपे मदद करना जारी रखा और इस प्रकार कश्मीर को पृथकतावादियों के जुनून और कश्मकश में भी डाले रखा. इस ख़ुदग़र्ज़ राजनीति के कारण कश्मीर के माहौल में एक नकारात्मक बदलाव तेज़ी से आना शुरू हो गया. एक तरफ़ बिचौलियों की सिफ़ारिशों पर सरकारें घाटी में अपार धन भेजती रहीं और दूसरी ओर कश्मीर के संदर्भ में ग़लत क़दम उठाती रहीं. कश्मीर की बर्फ़ के नीचे नफ़रत और पृथकतावाद की आग सुलगाने वालों की पीठ पर पाकिस्तान का हाथ साफ़ दिखाई देने लगा. देखा जाए तो पाकिस्तान की नज़र हमेशा कश्मीर पर रही है. अगरचे वह चार युद्धों के बावजूद कश्मीर को भारत से तोड़कर अपने साथ मिला नहीं सका. इसीलिए वह एक नए अंदाज़ में अपना भाग्य आज़माने पर उतर आया. दुनिया जानती है कि कश्मीर में चरमपंथियों के लिए ख़ुराक कहां से आती है. ख़ुद को कश्मीरी मुसलमानों का मसीहा बताने वाले पाकिस्तान ने कथित रूप से ‘आज़ाद कश्मीर’ की जनता की क्या हालत बना रखी है और उनके साथ कैसा सलूक किया जा रहा है यह कोई गिलगित और बलूचिस्तान जैसे इलाक़ों के लोगों से पूछे. पाकिस्तान का दावा है कि ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ यानी यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह घाटी में भारत का विरोध करें. पाकिस्तान शासित कश्मीर में भी कश्मीर के भविष्य के लिए कोई जनमत नहीं है. वहां भी स्पष्ट रूप से दो-तीन आवाज़ें हैं. एक कश्मीर को पाकिस्तान का भाग मानने वाले लोग, दूसरे उसे आज़ाद देश के रूप में देखने वाले लोग और अब कश्मीर के दोनों भागों को मिलाकर एक स्वतंत्र देश के रूप में देखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. वर्तमान में तेज़ी से बदलती परिस्थितियों के कारण पाकिस्तान ने कश्मीरी पृथकतावादियों से स्पष्ट रूप से कह दिया है कि उन्हें आज़ादी और ‘जनमत संग्रह’ के बजाय ‘डीमिलिट्राज़ेशन’ और ‘सेल्फ़ रूल’ या संप्रभुता की बात करनी चाहिए. हमने देखा है कि पाकिस्तान से वापस आने के बाद हुर्रियत नेताओं ने भी ‘यूनाईटेड जम्मू कश्मीर’ के साथ-साथ स्वशासन की मांग भी शुरू कर दी है. कश्मीर के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों ने अब स्वशासन और ‘डीमिलिट्राज़ेशन’ का राग अलापना शुरू कर दिया है. ‘औटोनोमी’ या स्वात्तता का नारा तो पहले से ही फ़ज़ा में मौजूद है. इन परिस्थितियों में हम कश्मीर समस्या के आंतरिक और बाहरी मामलों की गहराई की अनदेखी करके उसके हल की बात कैसे कर सकते हैं? इसके साथ जो दूसरे पहलू जुड़े हुए हैं वे हैं पृथकतावादियों की आवाज़ जो पूरे राज्य के लोगों की नहीं है. जम्मू के लोग, लद्दाख़ के लोग, गुज्जर, बकरवाल, शिया और कश्मीरी पंडित, सिख और दूसरे लोगों के अनुभव और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं. इसके अलावा जम्मू कश्मीर की राजनीतिक पार्टियां भारत के विरूद्ध नहीं हैं. इसलिए यह अनिवार्य है कि इस समस्या के समाधान के लिए सारे विचारों को सुना जाए. राज्य के तीनों क्षेत्रों के लोगों की क्षेत्रीय और ‘जिओ-पौलिटिकल’ या भौगोलिक और राजनैतिक अपेक्षाओं को ज़ेहन में रखा जाए. इस प्रकार इसका कोई स्थाई हल तलाश किया जाए जिससे सभी की अपेक्षाए पूरी हो सकें. पिछले 17 वर्षों से जारी आतंकवाद ने घाटी के मूल निवासी कहे जाने वाले लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है. ‘जेहाद’ और ‘निज़ामे-मुस्तफ़ा’ के नाम पर बेघर किए गए लाखों कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. ऐसे में जातिसंहार और निष्कासन के शिकार कश्मीरी पंडित घाटी में अपने लिए ‘होम लैंड’ की मांग कर रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि ऐसे में हम ज़्यादा देर तक राज्य को नए सिरे से दोबारा रूप देने की ज़रूरत से बच सकते हैं. कश्मीर के लिए विभिन्न प्रकार के विवाद, परस्पर विरोध को समझने की सबसे अधिक ज़रूरत है. अगर ऐसा न हुआ तो हम चाहे कितना भी ‘गोलमेज़ सम्मेलन’ कर लें, कहीं नहीं पहुंचेंगे. बात करना तो ठीक है मगर शर्त यह है कि बात पते की हो. |
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