भारतीय राजनीति के मिथक
 
 
 
 
 
 
 
राजनीतिक उदासीनता
 
 
देश में चुनावी राजनीति के प्रति उदासीनता गहरी होती जा रही है

देश में चुनावी राजनीति के प्रति उदासीनता गहरी होती जा रही है

 

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की कलम से

झूठ के सबसे नज़दीक यही सातवां मिथक है. दरअसल, इसमें सच का अंश महज़ इतना है कि तथाकथित शहराती मध्य-वर्ग में राजनीति, राजनेता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर उदासीनता और द्वेष पनप रहा है.

राजनीति से घृणा करना मानो एक फ़ैशन बन गया है. समाज का ये तबका वोट डालने को मामूली काम मानकर महत्व नहीं देता. इसमें किसी भी क़िस्म की राजनीतिक भागीदारी से दूर रहने की प्रवृति बढ़ी है.

दुर्भाग्यवश हमारे देश के बुद्धिजीवी और मीडिया ख़ुद इसी वर्ग से आते हैं. इसलिए, हमलोग इस शहराती सम्पन्न वर्ग की प्रवृति को पूरे समाज की प्रवृति मानने की भूल करते हैं.

हक़ीक़त

हक़ीक़त ये है कि अपने देश में राजनीतिक लोकतंत्र का नया दौर आया है. इस दौर में राजनीतिक उदासीनता नहीं बल्कि राजनीतिक भागीदारी का उफान देखने को मिला है.

जहाँ दुनिया के तमाम अमीर देशों और स्थापित लोकतंत्रों में मतदान प्रतिशत धीरे-धीरे गिरता जा रहा है, वहीं हमारे देश में मतदान प्रतिशत धीरे-धीरे बढ़ा है.

मतदान की बात छोड़ दें, सिर्फ राजनीति में भागीदारी और दिलचस्पी के अन्य संकेतों पर गौर करें, तब भी भारतीय लोकतंत्र दुनिया के तमाम लोकतंत्रों की तुलना में इक्कीस ही है.

चाहे राजनीति में दिलचस्पी का सवाल हो या राजनीतिक दलों से नज़दीकी महसूस करने का या फिर राजनीतिक दलों की सदस्यता का- हर लिहाज से हमारे नागरिकों की राजनीति में भागीदारी कहीं ऊँचे दर्जे की है. और हां, यहाँ हम राजनीतिक दलों के दावों का बात नहीं कर रहे हैं बल्कि स्वयं लोगों का ऐसा कहना है.

पश्चिमी देशों की राजनीति में जैसे-जैसे हम राष्ट्रीय स्तर से राज्य स्तर की तरफ़ आते हैं वैसे-वैसे चुनाव और राजनीति में भागीदारी तेज़ी से गिरती जाती है.

हमारे देश में ठीक उलटा है. लोकसभा चुनाव में अमूमन 60 प्रतिशत वोट पड़ते हैं लेकिन विधान सभा में 70 प्रतिशत और पंचायत स्तर पर 80 फ़ीसदी से भी अधिक. यहां गौर करने की बात ये है कि हमारे लोकतंत्र में भागीदारी की सामाजिक बुनावट बड़ी अलग है.

पश्चिम से अलग

पश्चिम के लोकतंत्र का आंकड़ा कहता है कि जिसकी सामाजिक हैसियत जितनी अधिक उसकी राजनीति और चुनाव के खेल में भागीदारी उतनी अधिक.

यानी आप सामाजिक हैसियत की जितनी ऊंची सीढ़ी पर हैं, वोट डालने और राजनीतिक दल से नजदीकी महसूस करने की आपकी संभावना उतनी ही अधिक है.

ये भारतीय लोकतंत्र की अनूठी उपलब्धि है कि यहाँ चुनाव में भागीदारी और समाजिक हैसियत का कोई संबंध नहीं है. जाति व्यवस्था की निचली पायदान पर खड़ा दलित समाज आज ‘अगड़ी जातियों’ से ज़्यादा मतदान करता है.

शहरी मध्यम वर्ग की तुलना में शहर का ग़रीब कहीं ज़्यादा मतदान करता है, शहरों की तुलना में गांवों में अधिक मतदान होता है. और पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं-पुरुषों, आदिवासी-ग़ैर-आदिवासियों के बीच मतदान का फ़ासला भी बहुत कम हुआ है.

इस जनभागीदारी के उफान ने हमारे यहां लोकतंत्र के चरित्र को बदला है और उसे वो गहराई दी है जो इतिहास में बहुत कम समाजों को नसीब हुई है.
 
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