भारतीय राजनीति के मिथक
 
 
 
 
 
 
परिसीमन का गणित
 
 
 
चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन से सारे बने-बनाए समीकरण ध्वस्त हो जाएंगे

परिसीमन से सारे बने-बनाए समीकरण ध्वस्त हो जाएंगे

 

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की कलम से

यह बात सच भी है और नहीं भी. क्योंकि परिसीमन क्या है और इसका परिणाम क्या होगा-इस पर हम ध्यान से ग़ौर नहीं करते हैं और झट से ऐसे फैसले पर पहुँच जाते हैं.

परिसीमन नई चीज़ है, बहुत सालों बाद हुई है इसलिए हम अचानक हड़बड़ा बैठते हैं कि इससे सारा खेल बिगड़ जाएगा.

ये सच है कि परिसीमन चुनाव के स्थानीय गणित को ज़रूर बदलेगा. लेकिन राज्यस्तर और ख़ास तौर से राष्ट्रीय समीकरण को बड़े बुनियादी तरीक़े से नहीं बदल पाएगा.

दरअसल, 1977 से चले आ रहे चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को नए तरीक़े से परिभाषित किया गया है. एक चुनाव क्षेत्र से एक से ज़्यादा चुनाव क्षेत्र बनाए गए हैं. कुछ चुनाव क्षेत्र ख़त्म कर दिए गए हैं या दूसरों के साथ मिला दिए गए हैं.

कहीं-कहीं बिल्कुल नए चुनाव क्षेत्र बनाए गए हैं. इससे पुराने चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं बदली गई हैं. जाहिर है ये बड़ा उलटफेर है और इससे स्थानीय स्तर का राजनीतिक और सामाजिक गणित पूरी तरह बदल जाएगा.

थोड़ा असर

जिस क्षेत्र या समुदाय के सहारे नेता चुनावी लड़ाई में विजय का दावा करते थे अगर वही क्षेत्र या समुदाय उनसे निकल जाए तो उनकी स्थिति बदलेगी ही.

इसके चलते समाजिक समीकरण बदलेंगे, कौन सा मुद्दा चुनाव में कितना महत्वपूर्ण होगा, यह भी बदलेगा. इससे कई क्षेत्रों में पार्टी विशेष की जीत-हार की संभावना बदलेगी.

लेकिन इतने भर से ये निष्कर्ष निकालना कि परिसीमन पूरे चुनाव का कुल जोड़-जमा बदल देगा, एक जल्दबाज़ी होगी. ये एक स्तर के निष्कर्ष को दूसरे स्तर के निष्कर्ष पर थोपने वाली बात होगी.

सच्चाई ये है जहाँ परिसीमन के चलते एक पार्टी को एक क्षेत्र में लाभ होगा, वहीं पड़ोस वाले चुनाव क्षेत्र में उसी पार्टी को नुक़सान होगा.

जब इन तमाम स्थानीय समीकरणों का जोड़-जमा निकाला जाएगा तब ये सब छोटे-छोटे नफ़ा-नुक़सान एक दूसरे को बराबर कर देंगे. मतलब ये कि किसी एक पार्टी को कोई बड़ा नुक़सान या फ़ायदा होने वाला नहीं है.

हाँ, एक फ़र्क़ ज़रूर हुआ है. पिछला परिसीमन 1971 की जनसंख्या के आधार पर था और नया परिसीमन 2001 की जनसंख्या के आधार पर किया गया है.

इस बीच शहरी जनसंख्या का अनुपात बढ़ा है. शहरी जनसंख्या बढ़ने से ज़ाहिर है शहरी इलाक़ों में सीटें बढ़ी है. भाजपा को अमूमन शहरी इलाक़ों में कुछ ज़्यादा समर्थन मिलता है.

ज़ाहिर है इसके परिणामस्वरूप भाजपा को कुछ लाभ होता. लेकिन 2004 के चुनाव के बाद से शहरी क्षेत्र में बीजेपी को होने वाला लाभ अपेक्षाकृत कम हो गया है. इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि केंद्र में सरकार बनाने के समीकरण पर परिसीमन का कोई बहुत बड़ा असर पड़ेगा.
 
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