भारतीय राजनीति के मिथक
 
 
 
 
युवा अहम वोट बैंक
 
 
 
 
 
युवा वर्ग एक अलग और सबसे महत्वपूर्ण वोट बैंक है

युवा वर्ग एक अलग और सबसे महत्वपूर्ण वोट बैंक है

 

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की कलम से

हमारे समाज में, किसी भी दूसरे समाज से युवा-वर्ग का अनुपात ज़्यादा है. इस लिहाज़ से वे महत्वपूर्ण हैं. लेकिन असली सवाल ये है कि क्या राजनीतिक दृष्टि से उनके विचार, रुझान और पसंद-नापसंद समाज की अन्य पीढ़ियों से अलग है.

युवाओं को एक अलग वर्ग के रूप में देखने की प्रवृति का कारण क्या है. यही कि हम राजनीति के सिद्धांत पश्चिम से उधार लेते हैं जहाँ समुदाय या वर्ग के भेद से ज़्यादा पीढ़ियों का भेद राजनीति में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण कारक है.

एक ज़माने में लेबर पार्टी और पिछले कुछ समय से ग्रीन पार्टी जैसे दल मुख्यतः युवाओं के वोट पर खड़े होते रहे हैं.

युवा अलग नहीं

दूसरी वजह ये कि युवा वर्ग की छवि कहीं न कहीं महानगरों में बसने वाले अंग्रेज़ी बोलने वाले युवाओं से बनती है. हम अक्सर उन्हें ही युवा वर्ग का प्रतीक मान लेते हैं. जबकि हक़ीक़त में वे हमारे युवा वर्ग का एक बहुत छोटा हिस्सा है.

और तीसरा कारण ये कि परिवर्तन, क्रांति और बदलाव की राजनीति ने युवाओं से जो उम्मीदें बांधी थीं उसका अंश आज भी कहीं ना कहीं हमारी राजनीतिक समझदारी में क़ायम है.

हक़ीक़त ये है कि युवा-वर्ग राजनीति में हिस्सेदारी के लिहाज़ से बुज़ुर्गों या अन्य किसी पीढ़ी से बहुत अलग नहीं है, अगर अलग है तो इस मायने में कि उसकी भागीदारी दूसरे वर्ग से कम है क्योंकि उसे शिक्षा और रोज़गार की चिंता ज़्यादा रहती हैं.

मतदान या राजनीतिक पसंद के लिहाज़ से युवाओं और बाक़ी पीढ़ियों के वोट में किसी भी बुनियादी मायने में अंतर नहीं है.

अगर अंतर है तो सिर्फ़ इस मायने में कि जो पार्टियां पिछले 25-30 साल में आई हैं, उसके बारे में युवाओं ने ज़्यादा सुना होता है, इसलिए उनकी पसंद ये पार्टियां कुछ ज़्यादा होती है.

पुरानी पार्टियों को युवाओं का समर्थन अमूमन थोड़ा कम मिलता है. हालाँकि इसका युवा होने से कोई ताल्लुक़ नहीं है इसकी वजह उस पार्टी के बारे में सूचना का कुछ ख़ास लोगों तक सीमित रहना है.

भाजपा को लाभ नहीं

पूरे देश भर में किसी एक पार्टी को युवाओं का ज़्यादा समर्थन नहीं मिलता. एक ज़माने में भाजपा को ये समर्थन मिल रहा था, लेकिन उभार के पांच-सात साल बाद ये असर ख़त्म हो गया और अब भाजपा को वैसा लाभ युवा वर्ग में नहीं मिलता .

सबसे हैरानी की बात है कि हिंदुस्तान में युवा वर्ग किसी भी मायने में एक अलग विचार का वाहक नहीं है.

सवाल चाहे बदलाव का हो या समता का, चाहे परंपरागत बेड़ियों-बंदिशों की बात हो या शादी में आजादी का सवाल-युवा-वर्ग में इन सब सवालों के जवाब बुनियादी तौर पर अन्य पीढ़ियों से अलग नहीं है.

गहराई से सोचें तो इसमें हैरानी की बात नहीं है. युवा अलग तब होते हैं जब उस युग में बदलाव की राजनीति का बोलबाला हो. जैसे 50 के दशक में था. तब युवा बाकियों से जरा हटके थे.

जिस समाज में बदलाव की राजनीति अपने आप हाशिए पर खिसक जाती है उसमें युवा और दूसरी पीढ़ियों में कोई अंतर नहीं रहता.
 
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