भारतीय राजनीति के मिथक
चुनाव के मिथक
 
 
 
 
 
 
 
 
 
भारतीय राजनीति के मिथक

भारतीय राजनीति के मिथक

 

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव की कलम से

मिथक का पड़ाव सच और झूठ के दो विपरीत छोरों के बीच आता है. मिथक सच नहीं कहते, लेकिन सच होने का आभास देते हैं. इसलिए मिथक ताक़तवर होते हैं और हम उन्हें खालिस झूठ का दर्जा नहीं दे सकते.

मिथक भारतीय राजनीति के भी हैं. मसलन ये कि भारत में चुनाव बस जाति का खेल हैं या ये कि औरतें वहाँ वोट डालती हैं, जहाँ उनके घर के मर्द कहते हैं.

हर मिथक में सच का एक अंश होता है. एक छोटा सा हिस्सा जो पूरा सच होने का दावा करता है, जो सच के बाक़ी सब अंशों को दबोच लेता है.

इसी कारण मिथक ख़तरनाक़ होते हैं. नज़र पर पर्दा डाल देते हैं. इसीलिए इन्हें ठीक से समझना ज़रूरी है.

क्यों हैं इतने मिथक ?

हमारे देश में और सच कहें तो इस पूरे महाद्वीप में राजनीति बहुत गहरी समाई हुई है. पान की हर दुकान पर, हर ढ़ाबे और ठेले के इर्द-गिर्द, राजनीति हमारी रगों में दौड़ती है.

अगर भारतीय राजनीति के बारे में ढेरों मिथक प्रचलित हैं तो उसकी एक वजह ये भी है कि जो चीज़ हमें जितना गहरा प्रभावित करती है उसके बारे में हम अक्सर उतने ही ढीले-ढाले तरीक़े से सोचते हैं. बिना तर्क किए उसे सहज और सिद्ध मान लेते हैं.

एक दूसरी वजह भी है भारतीय राजनीति से जुड़े इतने सारे मिथकों की. हमारे देश में बाक़ी सब चीज़ों पर तथ्यों और आंकड़ों को इकठ्ठा करने की कोशिश हुई.

भारत सामाजिक और आर्थिक मायनों में दुनिया में आंकड़ों के सबसे बड़ा और सबसे विश्वस्नीय संग्रह का मालिक है, लेकिन राजनीति के बारे में विश्वसनीय तरीक़े से आंकड़े जुटाना और उनका तथ्य पर आधारित विश्लेषण करना कहीं हमारे मिजाज़ में नहीं है.

शायद ये हमारे राजनीति शास्त्र के विधान में भी नहीं है. इसीलिए कई ऐसे विश्वास जो दशकों पहले ख़ारिज हो जाने चाहिए थे आज भी चल रहे हैं.
 
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