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फिर अस्थिरता की ओर नेपाल

 बुधवार, 30 मई, 2012 को 05:33 IST तक के समाचार

नेपाल में राजनीतिक पार्टियों के संविधान बना पाने में नाकाम रहने से जनता में असंतोष बढ़ रहा है

नेपाली राजनेताओं में संविधान पर सहमति ना बन पाना और इस कारण प्रधानमंत्री के नए चुनाव करवाने की घोषणा, देश में दशक भर चले माओवादी चरमपंथी के खत्म होने के बाद चल रही शांति प्रक्रिया के लिए सबसे बड़ा आघात है.

रविवार को हुए दो घटनाक्रमों से उन लाखों नेपाली नागरिकों की उम्मीदों पर पानी फिर गया जो कुठाराघात साबित हुए जिन्होंने 2008 में पहले लोकतांत्रिक और समावेशी संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा का चुनाव किया था.

नेपाल में माओवादी नेतृत्व में संघर्ष के फिर से शुरू होने की संभावना कम है क्योंकि पूर्व विद्रोहियों को या तो छोड़ दिया गया है या फिर उन्हें सेना में जगह दी जा चुकी है. लेकिन देश के सांप्रदायिक हिंसा में घिरने की संभावना को नहीं नकारा जा सकता.

देश का नया संघीय ढांचा जातीय आधार पर तैयार किया जाए या नहीं, इसे लेकर विभिन्न गुटों के बीच के भरोसे में लगातार हो रही कमी से हिंसा का डर बढ़ रहा है.

यही वो सबसे प्रमुख कारण है जिससे कि रविवार को सभी पार्टियाँ संविधान बना पाने में नाकाम रहीं और इसके लिए नई समयसीमा की घोषणा की गई.

कानूनी सिरदर्द

प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने आधी रात को संविधान सभा को भंग कर नए चुनाव की घोषणा की

प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई की 22 नवंबर को चुनावों की घोषणा के कारण हालात और जटिल हो सकते हैं क्योंकि इससे नेपाल की अलग-अलग पार्टियों का और ध्रुवीकरण हो रहा है.

अंतरिम संविधान में नए चुनावों का कोई प्रावधान नहीं है. ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियों के बीच रजामंदी होना जरूरी है. कोई चुनी हुई संस्था न होने के कारण चुनाव करवाने के लिए जरुरी नियम बनाना एक कानूनी सिरदर्द हो सकता है.

विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने मौजूदा संविधान सभा को ही अंतरिम संसद मान लेने की उनकी अपील को मानने से इनकार कर दिया.

वो दलील देते हैं कि है कि ये काम मात्र संवैधानिक संशोधन से किया जा सकता था, बजाय चुनावों की घोषणा करने के जिसका कि कोई कानूनी व संवैधानिक आधार नहीं है.

देश की दूसरी व तीसरी बड़ी पार्टियों, नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल, सहित पाँच दलों ने प्रधानमंत्री के फैसले को चुनौती देते हुए राष्ट्रपति रामबरन यादव से अपील की है.

विपक्ष का तर्क है कि संविधान सभा के भंग होने के साथ ही बाबूराम भट्टाराई के प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का हक स्वतः समाप्त हो गया है.

"प्रधानमंत्री के फैसले ने आपसी सहमति बनाने की पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया है"

भीम राव, सीपीएन-यूएमएल

ये सभी अब राजनीतिक पार्टियों की आपसी सहमति पर आधारित कोई नई व्यवस्था चाहते हैं.

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि अगर चुनाव हुए तो विपक्ष इसका बहिष्कार करेगा या नहीं.

देश की तीसरी बड़ी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल - यूएमएल के नेता भीम रावल ने कहा,“प्रधानमंत्री के फैसले ने आपसी सहमति बनाने की पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार दिया है. मैं अभी नहीं बता सकता कि आगे क्या हो सकता है.”

मगर प्रधानमंत्री भट्टाराई के मुख्य राजनीतिक सलाहकार देवेंद्र पौडेल ने विपक्ष पर केवल प्रचार के लिए चुनावों का विरोध करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अंततः ये सभी दल चुनाव में हिस्सा लेंगे.

उन्होंने कहा कि नवंबर में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने ना केवल वर्तमान संविधान सभा के कार्यकाल के आगामी विस्तार पर रोक लगाई बल्कि नए चुनावों का रास्ता भी साफ कर दिया था.

मौजूदा विवाद के कारण राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच सत्ता संघर्ष छिड़ सकता है क्योंकि अंतरिम संविधान में दोनों को कुछ आपात अधिकार प्राप्त हैं.

सांप्रदायिकता

नेपाल में इस बार जातीय समूहों ने भी संविधान बनाए जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किए

ऐसा लगता है कि तमाम खींचतान के बावजूद रविवार को दोनों पक्ष मध्यरात्रि की समयसीमा तक नए संविधान के बारे में एक सहमति पर पहुंचने के करीब थे.

मगर नेपाल को संघीय प्रांतों में कैसे बाँटा जाए, इसे लेकर विवाद बना ही रहा और सहमति की संभावना खत्म हो गई.

15 पार्टियों की गठबंधन सरकार, जिसमें कि कई जातीय गुटों के प्रतिनिधि शामिल हैं, उनकी अगुआई करनेवाले माओवादियों की मांग है कि प्रांतों का गठन और नामकरण ऐसा हो जिससे कि उन क्षेत्रों के बहुसंख्यक जातीय गुटों की पहचान प्रकट हो सके.

लेकिन नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल का कहना है कि जातीय संघवाद से सांप्रदायिक संबंधों पर असर पड़ेगा और अलगाववाद के बीज पड़ेंगे.

फिलहाल ये स्पष्ट हो गया है कि राजनीतिक दलों के बीच संविधान को लेकर कोई सहमति नहीं हो पाई औऱ इसके बाद लोग राजनेताओं की क्षमता और उनकी राजनीतिक इच्छा को लेकर संदेह प्रकट करने लगे हैं.

बहुत सारे लोगों को इस बात का भरोसा नहीं है कि नए चुनाव के बावजूद राजनीतिक दल संविधान बना सकेंगे.

राजशाही

राजनीतिक अनिश्चितता ने एक बार फिर संघर्ष की आशंका को बढ़ा दिया है

ऐसी स्थिति में ऐसी अटकलें जोर पकड़ने लगी हैं कि पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र बढ़ते असंतोष का लाभ उठा सकते हैं.

ये शायद संयोग नहीं कि शाही परिवार की एक वेबसाइट उस संविधान सभा के भंग करने के समय शुरू की गई जिसने कि राजशाही को उखाड़ फेंका था.

ऐसी भी अपुष्ट खबरें आई है कि पूर्व नरेश के कुछ सहयोगियों ने गठबंधन बनाने के लिए राजनीतिकद दलों से संपर्क किया है.

हालँकि कई लोगों को नहीं लगता कि राजशाही की वापसी हो पाएगी.

जानकारों का मत है कि तमाम मौजूद विवादों के बावजूद नेता राजनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सफल होंगे.

लेकिन नए संविधान के बिना नेपाल में फिर से हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बना हुआ है.

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