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अहम हैं अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव

अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के बढ़ते प्रभाव के बीच सुरक्षित और विश्वनीय तरीके से चुनाव करवाना एक बड़ी चुनौती है.

अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास में दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहा है. पिछला चुनाव 2004 में हुआ था जिसमें वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करज़ई जीते थे.

अफ़ग़ानिस्तान के स्वतंत्र चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक अब तक चुनावी दौड़ में 41 उम्मीदवारों के नाम हैं. मुख्य मुकाबला राष्ट्रपति हामिद करज़ई, पूर्व वित्त मंत्री अशरफ़ ग़नी और पूर्व विदेश मंत्री अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच है.

उम्मीदवारों का मुस्लिम होना ज़रूरी है और उम्र 40 साल से ज़्यादा होनी चाहिए.

पिछले कुछ समय से वहाँ चुनाव अभियान भी चल रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनाव के कुछ उम्मीदवारों के बीच बहस का पहली बार टेलीविज़न पर प्रसारण भी किया गया. हालांकि राष्ट्रपति करज़ई ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था.

सुरक्षा की चिंता

चुनावी तथ्य

कुल उम्मीदवार-41

कुल मतदाता-एक करोड़ 70 हज़ार

मतदान केंद्र-7000 ( 700 को लेकर सुरक्षा चिंता)

राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच साल का, मुस्लिम होना ज़रूरी

67 देशों से करीब 25 पर्यवेक्षक रहेंगे

अंतिम नतीजा 17 सितंबर को

34 प्रांतों के लिए 420 काउंसिल सीटों के लिए भी चुनाव.

चुनाव अभियान के दौरान कई बार हिंसा भी हुई है. चुनावों की घोषणा के बाद से वहाँ हिंसक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है. जुलाई में राष्ट्रपति हामिद करज़ई के सहयोगी और उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार मोहम्मद क़ासिम फ़हीम के काफ़िले पर हमला किया गया था.

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार अब्दुल्ला अब्दुल्ला के अभियान मैनेजर इस्माइल के वाहन पर हमला हुआ था और वे बुरी तरह घायल हो गए थे.

तालेबान चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर चुका है. तालेबान समर्थित एक वेबसाइट पर जारी बयान में लड़ाकों से चुनावों से पहले सड़कों पर बाधा खड़ी करने और मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर न जाने देने को कहा है.

बयान में कहा गया है कि मतदान में हिस्सा लेने का मतलब होगा अमरीका की मदद करना.

तीन सितंबर को चुनाव के शुरुआती नतीजे आएँगे लेकिन गणना में कई हफ़्तों का समय लगता है. अंतिम और प्रमाणित नतीजे 17 सितंबर को ही घोषित होंगे. मतगणना का काम मतदान केंद्रों पर होगा जबकि ये सुनिश्चित करना कि मत सही तरीके से गिने गए हैं या नहीं, ये काम काबुल में होगा.

वैसे देश के संविधान के तहत राष्ट्रपति मई में होना चाहिए था लेकिन बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के कारण इसे मई से टालकर अगस्त कर दिया गया था. अफ़ग़ानिस्तान के दक्षिण और पूर्व के इलाक़ों में सुरक्षा स्थिति बेहद नाज़ुक मानी जाती है. सुरक्षा इंतज़ाम पुख़्ता करने के लिए हज़ारों की संख्या में अमरीकी सैनिक मदद कर रहे हैं.

मतदान

आर्थिक और तकनीकी कारणों से भी चुनाव को मई की बजाय अगस्त में करवाया जा रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में स्वतंत्र चुनाव आयोग( आईईसी) ने जनवरी में कहा था कि अगस्त से पहले उम्मीदवारों के नामों की घोषणा, मतपत्रों की छपाई और उन्हें दुर्गम इलाकों तक पहुँचाने का काम पूरा नहीं हो सकेगा.

संविधान के मुताबिक चुनाव करवाने की ज़िम्मेदारी स्वतंत्र चुनाव आयोग पर होती है जिसमें नौ सदस्य हैं. राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच साल के लिए होता है और वो दो बार ही राष्ट्रपति बन सकता है. जीतने के लिए उसे डाले गए मतों में से 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हासिल करने होते हैं.

अगर किसी को 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट हासिल नहीं होते हैं तो नतीजे घोषित होने के दो हफ़्ते बाद रन-ऑफ़ चुनाव होता है.

अफ़ग़ानिस्तान में कुल 7000 हज़ार मतदानकेंद्र हैं. महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग केंद्र हैं. लेकिन सुरक्षा कारणों को देखते हुए शायद 700 केंद्रों पर मतदान न हो सके.

पिछले साल अक्तूबर से लेकर इस साल फ़रवरी तक वोटरों के पंजीकरण की मुहिम चलाई गई थी.

बीबीसी को जानिए

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