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बुधवार, 01 अक्तूबर, 2003 को 18:08 GMT तक के समाचार
टेलीफ़ोन टैपिंगःकितनी कारगर?
अदालत केवल टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत को प्रमाण नहीं मानती
अदालत केवल टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत को प्रमाण नहीं मानती



भारत में अक्सर किसी-ना-किसी मुक़दमे के दौरान टैपिंग यानी टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत के रिकॉर्ड करने की बात सामने आती रही है.

इनमें कई मुद्दे तो लंबे समय तक सुर्खियों में छाए रहे.

क्रिकेट मैच फ़िक्सिंग और बॉलीवुड-माफ़िया रिश्तों से जुड़े मामलों में टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत को रिकॉर्ड किया गया और उनकी व्यापक चर्चा हुई.


इससे मामले को मज़बूती ज़रूर मिलती है मगर ये सबकुछ नहीं है

सत्यपाल सिंह, मुंबई पुलिस
क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ सट्टेबाज़ों और फ़िल्मी सितारों के साथ माफ़िया की कथित बातचीत शब्द-दर-शब्द अख़बारों में छपीं और टेलीविज़न पर सुनाई भी गई.

मगर देखा ये गया कि ज़्यादातर मामले ढाक के तीन पात बनकर ही रह गए.

मैच फ़िक्सिंग मामले में तो पुलिस एफ़आईआर तक दर्ज नहीं कर सकी.

और बॉलीवुड-माफ़िया मामले में भरत शाह भी लगभग बेदाग ही बाहर निकल आए.

तो आख़िर कितना दमदार है ये टेलीफ़ोन पर बातचीत रिकॉर्ड करने का तरीक़ा?

अपर्याप्त सबूत

बॉलीवुड - माफ़िया रिश्तों की पड़ताल कर रही मुंबई पुलिस के संयुक्त आयुक्त सत्यपाल सिंह के अनुसार केवल टैपिंग से ही बात नहीं बनती.


ये ऐसा है कि आपने कुछ पकड़ा और क़ानून कहता है कि जिसे पकड़ा है उसे बिना किसी संदेह के साबित करें

एच आर ए ख़ान सुहेल, वकील
उन्होंने बताया, "इससे मामले को मज़बूती ज़रूर मिलती है मगर ये सबकुछ नहीं है."

दिल्ली में मैच फ़िक्सिंग मामले में बचाव पक्ष के वकील एच आर ख़ान सुहेल के अनुसार ये ऐसा ही है कि जैसे किसी घटना का एक छोर पकड़ लिया जाए और फिर आगे क़दम बढ़ाया जाए.

वे कहते हैं, "ये ऐसा है कि आपने कोई चीज़ पकड़ ली और क़ानून ये कहता है कि जो चीज़ आपने पकड़ी है उसे आप बिना किसी संदेह के साबित करें."

क़ानूनी व्यवस्था

वक़ील एच आर ख़ान सुहेल ने बताया कि भारतीय क़ानून में 1973 के आर एम मलकानी और महाराष्ट्र सरकार के बीच चले मुक़दमे को टेलीफ़ोन टैपिंग से जुड़े मुक़दमों में आधार माना जाता है.

इस मुक़दमे में कुछ बातें स्पष्ट की गईं.

  • इस बात की जाँच ज़रूरी है कि जो बातचीत हुई वह किसी विषय के संबंध में पूरी तरह प्रासंगिक है कि नहीं.

  • ये साबित करना ज़रूरी है कि रिकॉर्ड की गई आवाज़ उसी व्यक्ति की है कि नहीं.

  • ये जाँच ज़रूरी है कि रिकॉर्ड की गई बातचीत बिल्कुल सटीक और प्रामाणिक है और उसके साथ कोई तकनीकी छेड़छाड़ नहीं की गई.

  • ये भी ज़रूरी है कि इस बातचीत के अलावा और भी सहायक प्रमाण हैं कि नहीं.

    उदार क़ानून

    एच आर ए ख़ान सुहेल के अनुसार भारतीय क़ानून में जो 'एविडेंस एक्ट' हैं वह काफ़ी तर्कसंगत और उदार है.

    ख़ान कहते हैं, "भारतीय क़ानून में ऐसी व्यवस्था की गई है कि किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं दी जा सकती."

    उन्होंने कहा कि हाँलाकि कई बार कुछ विशेष क़ानून आए जिनमें कई बातों को परे रख दिया गया मगर यहाँ भी ऊपरी अदालतों ने निर्देश जारी किए.

    एच आर ए ख़ान सुहेल ने बताया कि ऊपरी अदालतों ने ऐसी कई स्थितियों में 'बेहद सावधानी बरतने' के निर्देश जारी किए और कहा कि ऐसे सबूत लाए जाएँ जिनसे मुलज़िम के गुनाह को साबित किया जा सके.

    तो चाहे वह मैच फ़िक्सिंग हो या फिर बॉलीवुड-माफ़िया रिश्तों का मामला, इन सभी में पुलिस ने टेलीफ़ोन पर बातचीत रिकॉर्ड ज़रूर की मगर 'सहयोगी प्रमाण' जुटाने में उन्हें इतनी सफलता नहीं मिल पाई.

    नतीजा ये हुआ कि जिन हस्तियों की टेलीफ़ोन पर विवादास्पद बातचीत के कथित मामले सामने आए उनमें ज़्यादातर को क़ानूनी शिकंजे में जकड़ा नहीं जा सका.
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