|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अफ़ग़ानिस्तान में सिखों की नई कोशिश
अफ़गानिस्तान में तालेबान शासन को ख़त्म हुए दो वर्ष हो चुके हैं और वहाँ रह रहे सिख एक बार फिर पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं. सिखों को उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ भारत से अफ़ग़ानिस्तान लेकर गए थे और एक समय ऐसा था कि वहाँ की अर्थव्यवस्था में सिखों का बोलबाला था. लेकिन 1990 के बाद छिड़े गृहयुद्ध और उसके बाद आए तालेबान शासन ने सब कुछ बदल कर रख दिया. अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे ज़्यादातर सिख पश्तो भाषा बोलने वाले अफ़ग़ान नागरिक हैं. उनकी संख्या कुछ हज़ार है और वे राजधानी काबुल के अलावा जलालाबाद, ग़ज़नी और तालेबान के गढ़ कंधार में बसे हुए हैं. काबुल की एक संकरी सी धूल भरी सड़क के किनारे एक मंदिर में कुछ सैकड़ों सिख और कुछ हिंदू हर रविवार प्रार्थना के लिए इकट्ठे होते हैं. इस मंदिर को वे धरमसाल कहते हैं. सिख और हिंदू आबादी वाला यह मोहल्ला कार्टे परवान कहलाता है और ज़्यादातर लोग यहीं रहते हैं. राजिंदर सिंह मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख हैं. वे बताते हैं कि यह मंदिर 45 साल पहले राजा ज़हीर शाह के शासन के दौरान बनवाया गया था तब उनके लिए प्रार्थना की कोई जगह नहीं थी. वे बताते हैं कि तब सिख हिंदुओं के साथ मिलकर प्रमुख शहरों में मुद्रा बाज़ार चलाया करते थे. सब बदलने लगा उनके अनुसार मुजाहिदीनों के आने के बाद सब कुछ बदलने लगा. उन्होंने सोवियत सेना को खदेड़ दिया और तालेबान आ गए. रजिंदर सिंह कहते हैं, ''1992 में नजीबुल्ला सरकार को उखाड़ फेंका गया और सरदार आपस में झगड़ने लगे इससे हमें बहुत नुक़सान हुआ.''
ज़्यादातर लोग भारत चले गए और कुछ पाकिस्तान. काबुल में सिर्फ़ सौ से कुछ अधिक सिख परिवार बचे रह गए. उनको हज़ारों मील दूर अयोध्या में घट रही घटनाओं की क़ीमत भी चुकानी पड़ी. वो बताते हैं, ''जब 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई तो मुजाहिदीनों ने बदले में हमारे मंदिर में आग लगा दी.'' तालेबान शासन काल के दौरान तो स्थिति और बिगड़ती गई. उन्होंने सिखों और हिंदुओं के लिए पीला फ़ीता बाँधना ज़रुरी कर दिया और महिलाओं को बुर्क़ा पहनने पर मजबूर किया. धरमसाल के बाहर एक छोटी सी दुकान चलाने वाले इंदर सिंह मजबूर उस समय को एक कठिन समय के रुप में याद करते हैं. वे बताते हैं, ''हालांकि हमें पूजा-पाठ की अनुमति दे दी गई थी लेकिन हमें यह याद रखना ही होता था कि हम अल्पसंख्यक हैं.'' वापसी हुई लेकिन... तालेबान शासन के अंत और अफ़गान सरकार की वापसी से सिख परिवार लौटने लगे क्योंकि वे इसे ही अपना घर मानते थे. काबुल में सिख परिवारों की संख्या फिर 360 तक जा पहुँची है. प्रीत सिंह उन लोगों में से एक हैं जिन्हें लोया जिरगा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया.
और लोग भी अन्य शहरों में लौटे लेकिन लौटने वाले लोगों के सामने नई समस्याएँ थीं. लोगों की संपत्ति नष्ट हो गई थी और ज़्यादातर पर लोगों ने कब्ज़ा कर लिया था. गुरुचरन सिंह का परिवार अफ़ग़ानिस्तान में तीन पीढ़ियों से रह रहा है. दस साल बाद जब वे काबुल वापस लौटे तो पाया कि उनकी दुकान और मकान पर कबीलाई लड़ाकों ने कब्ज़ा कर लिया है. वे बताते हैं, ''मैं पिछले साल भर से दौड़ भाग कर रहा हूँ कि मुझे दुकान और मकान वापस मिल जाए.'' ''आख़िर मुझे भारी भरकम घूस देनी पड़ी और अब जाकर उम्मीद है कि मुझे अपनी मकान और दुकान वापस मिल जाएँगे.'' यह समस्या ज़्यादातर सिखों के साथ आई और बहुत कम लोग हैं जो वापस लौटकर अपने घरों में रह पा रहे हैं. कई समस्याएँ इसके अलावा भी समस्याएँ हैं. एक तो यह कि अब उन्हें अपने श्मसान तक जाने नहीं दिया जा रहा है, इसका उपयोग वे सौ साल से भी ज़्यादा समय से करते रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्री नासिर यार कहते हैं कि उन्हें इस समस्या की जानकारी है और वे इसे दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. हालाँकि वे अपने आपको अफ़ग़ान मानते हैं लेकिन साफ़ दिखता है कि उन्हें अपना जिंदगी का सामान जुटानें के लिए अभी बहुत कुछ करना होगा. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||