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मंगलवार, 09 सितंबर, 2003 को 13:22 GMT तक के समाचार भारत-इसराइल-अमरीका की धुरी?
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अरियल शेरॉन की भारत यात्रा का अपना ही महत्व है
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लुइ टिलिन
अरियल शेरॉन भारत का दौरा करने वाले पहले इसराइली प्रधानमंत्री हैं और यह यात्रा ही भारत और इसराइल के बीच बढ़ते मैत्री संबंध की निशानी है.
यह दौरा एक ऐसे समय में हो रहा है जब अमरीका में कई बुद्धिजीवियों और अन्य गुटों ने यह माँग तेज़ कर दी है कि भारत, इसराइल और अमरीका को चरमपंथ और इस्लामी कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ सामरिक रूप से महत्वपूर्ण एक धुरी क़ायम कर लेनी चाहिए.
भारत, इसराइल और अमरीका तीनों देशों की आतंकवाद की जड़ तक पहुँचने और उसके कारण खोजने में एक समान दिलचस्पी है | | रिचर्ड फ़ॉस्टर | भारत और इसराइल के बीच 1992 में कूटनीतिक संबंध बहाल होने के बाद द्विपक्षीय संबंध बढ़े हैं.
इस साल के शुरु में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार ब्रजेश मिश्र ने अमरीकी यहूदी समिति के वार्षिक भोज पर अपने भाषण में भारत का रुख़ पेश किया था.
उन्होंने कहा था कि तीनों देशों को मिल कर 'आधुनिक युग के आतंकवाद के घिनौने चेहरे' का मिल कर मुक़ाबला करना होगा.
उन्होंने कहा कि ऐसे गठबंधन के पास बढ़ते चरमपंथ के ख़िलाफ़ गंभीर फैसले लेने के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ नैतिक अधिकार भी होगा.
ये एक ऐसा विचार है जिसे कम से कम बुश प्रशासन के भीतर तो समर्थन मिला ही हुआ है.
साझा मूल्य
बुश प्रशासन भारत को एशिया में साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और फैलती अर्थव्यवस्था वाली एक क्षेत्रीय ताक़त के रुप में देख रहा है.
और जैसाकि वॉशिंगटन में सेंटर फ़ॉर सेक्योरिटी पॉलिसी के रिचर्ड फॉस्टर का कहन है बुश प्रशासन के भीतर जो इसराइल समर्थक मौजूद हैं वे भारत-इसराइल संबंधों में घनिष्ठता पर ख़ुश ही होंगे.
उनका कहना है, "तीनों देशों की आतंकवाद की जड़ तक पहुँचने और उसके कारण खोजने में एक समान दिलचस्पी है".
वह कहते हैं कि सामूहिक विनाश के हथियारों और ख़तरनाक मिसाइलों के अप्रसार पर भी तीनों के ही समान विचार हैं.
अमरीका ने अभी हाल मे जिस तरह भारत को फ़ैल्कन राडारों की बिक्री पर इसराइल को हरी झंडी दिखाई है वह भी इस बात का संकेत है कि सामरिक भागीदारी बढ़ रही है.
पाकिस्तान की चिंता
वैसे इन तीनों देशों के बढ़ते संबंधों को पाकिस्तान चिंता से देख रहा है.
भारत पाकिस्तान पर सीमापार से चरमपंथी गतिविधियों को भड़काने का आरोप लगाता है और इस बात को अमरीका के सामने भी उठाता रहा है.
लेकिन जब तक अमरीका तालेबान और अलक़ायदा के ख़िलाफ़ लड़ाई में पाकिस्तान पर निर्भर करेगा दक्षिण एशिया संबंधी अपनी नीति मे पूरी तरह संतुलन शायद नहीं ला पाएगा.
बुश प्रशासन ने हाल ही में पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर की सहायता का वायदा किया है और पाकिस्तान के रक्षा अधिकारी जल्दी ही पेंटगॉन के अधिकारियों से बात करने अमरीका जाएँगे.
और शायद इसीलिए अमरीका में कुछ लोग अमरीका-भारत-इसराइल की सामरिक धुरि के बारे में बात करने में हिचक रहे हैं.
वैसे, यह एक ऐसा मामला है जो अन्य लोगों के अलावा पाकिस्तान को भी परेशान किए हुए है. |
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