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बुधवार, 13 अगस्त, 2003 को 09:51 GMT तक के समाचार होड़ आदत बन गई है
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'अगर पड़ोसी के पास कार है तो हमारे पास क्यों ना हो !'
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सत्तर के दशक के बाद से ही पैसे की चाह और अपने पड़ोसी से बेहतर दिखने की ललक ने मध्यम वर्गीय जनमानस को एक तरह से जकड़-सा लिया है.
ये सच है कि उनके जीवन में नाटकीय बदलाव आए हैं. जो लोग बस से चलते थे उन्होंने स्कूटर ख़रीद लिए हैं.
स्कूटर से चलने वाले अब कार चलाने लगे हैं, पंखे का स्थान अब कूलर ने ले लिया है और कुछ खाते-पीते घरों में अब एयरकंडीशनर आ गए हैं.
नब्बे के दशक के बाद आई सूचना क्रांति के बाद अब ज़्यादातर घरों में टेलीफ़ोन हैं और अब तो मोबाइल फ़ोन भी तक़रीबन हर मध्यम वर्ग के व्यक्ति की पहुँच के भीतर है.
 मानक और मूल्य बदल रहे हैं | हिंदुस्तान अख़बार की संपादक मृणाल पांडे कहती हैं कि मध्यम वर्ग के बीच 'लोन' यानी क़र्ज़ लेने की संस्कृति बढ़ी है.
कारों और घरों के लिए लोन बहुत आसानी से मिल रहे हैं.
कर्ज़ से बदलाव आया है कि तीस साल के होते-होते लोग अपने निजी घर बनवा रहे हैं, पहले मकान रिटायरमेंट पर मिलने वाले पैसों से बना करते थे.
हमने लोन पर कार ख़रीदने वाले दिल्ली के रविकांत से पूछा कि आप लोन लेकर कार क्यों ख़रीद रहे हैं तो उनका जवाब था, "मेरे पड़ोसी के पास कार है तो ये तो स्टेटस की बात है. लोन से सब मैनेज हो जाता है."
"मेरी बीवी कहती है कि जब हमारे पड़ोसी के पास कार हो सकती है तो हमारे पास क्यों नहीं?"
होड़ की संस्कृति
पैसे की संस्कृति ने मध्यम वर्ग के बीच एक क़िले जैसी संस्कृति को जन्म दिया है.
जब तक उसकी दुनिया पानी से ऊपर है, बाक़ी सब डूबें तो उसकी बला से. जब तक उसके घर में बिजली है, चाहे वो लाइममैन को रिश्वत देकर या मीटर में छेड़छाड़ करके ही ली गई हो, बाक़ी अँधेरे में भी बैठें तो उसे कोई सरोकार नहीं.
कई बार उसे लगता है कि रिश्वत देकर काम चल सकता है तो वो रिश्वत देता है और जब उसका काम नहीं बनता है तो वो रिश्वत की बुराई करने लगता है. | | डॉक्टर योगेश बहल | जब तक उसका घर साफ़ है, गलियों में चाहें कूड़े का ढेर लगा हो, उसकी खाल पर कोई असर नहीं पड़ने वाला.
यूनेस्को के पूर्व निदेशक डॉक्टर योगेश बहल कहते हैं, "भारत मध्यम वर्ग प्रेक्टिकल माइंडेड है. उसकी स्थिति उस हाउस वाइफ़ जैसी है जो रेसेपी देखकर खाना नहीं बनाती."
"कई बार उसे लगता है कि रिश्वत देकर काम चल सकता है तो वो रिश्वत देता है और जब उसका काम नहीं बनता है तो वो रिश्वत की बुराई करने लगता है."
डॉक्टर अनुराग शुक्ल लखनऊ के विवेकानंद अस्पताल में चिकित्सक हैं. वह मानते हैं कि भ्रष्टाचार आजकल पराकाष्ठा पर पहुँच चुका है.
जब उनके सामने एक मिसाल रखी गई कि अगर कोई काम उनके लिए बहुत ज़रूरी हो और उसको पूरा करने के लिए उनसे रिश्वत माँगी जा रही हो तो वो क्या करेंगे?
इस पर उनका कहना था कि वो रिश्वत देने से परहेज़ नहीं करेंगे और वैसे भी रिश्वत सिर्फ़ पैसे से नहीं दी जाती है.
"आप किसी का काम करके भी उसे एक तरह से रिश्वत देते हैं."
असमंजस
ताज्जुब की बात ये है कि आर्थिक सुधारों से सबसे ज़्यादा लाभान्वित होने वाला मध्यम वर्ग ही इन सुधारों का सबसे बड़ा विरोधी है.
वो इंडियन एयरलाइंस या एमटीएनएल की मोनोपोली तो नहीं चाहता लेकिन साथ ही वो ये भी नहीं चाहता कि विनिवेश की प्रक्रिया में उसकी नौकरी पर कोई आँच आए.
व्यक्तिगत इच्छाओं के बल पर कोई समाज टिका नहीं रह सकता और न ही कोई देश सिर्फ़ बाज़ार बन कर रह सकता है.
क्या भारत का मध्यम वर्ग दीवार पर लिखी इस इबारत को पढ़ पाएगा?
अगर 'हाँ' तो अब भी उम्मीद है, अगर 'नहीं' तो अल्लामा इक़बाल के लफ़्ज़ों में शायद यही हाल होगा:
"वतन की फ़िक्र कर नादाँ, मुसीबत आने वाली है,
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमाँ में.
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्ताँ वालो,
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में." |
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