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शुक्रवार, 08 अगस्त, 2003 को 14:15 GMT तक के समाचार लक्ज़मबर्ग, आतंकवाद और गाँधी
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लक्ज़मबर्ग की दीवारों पर चिपके हुए हैं ये पोस्टर
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विनोद वर्मा
यूरोप से गुज़रते हुए लक्ज़मबर्ग की दीवारों पर यदि आपको महात्मा गाँधी की तस्वीरों वाले पोस्टर दिख जाएँ तो आपको आश्चर्य होगा.
मुझे भी हुआ.
और यह जानकर मेरा आश्चर्य बढ़ा कि इस पोस्टर का ताल्लुक़ भारत से नहीं है बल्कि स्थानीय ''आतंकवाद विरोधी क़ानून'' से है.
 गाँधी के बारे में कितनी जानकारी है? | फ़्रेंच में छपे इस पोस्टर से मैं सिर्फ़ इतना ही समझ सकता था.
आसपास लोगों से पूछना शुरु किया तो अधिकाँश लोगों को यह जानकारी ही नहीं थी कि आख़िर महात्मा गाँधी हैं कौन.
आख़िर दो पुलिस वालों ने उन्हें पहचाना और बताया कि पोस्टर यह सवाल उठाता है कि क्या महात्मा गाँधी को 'आतंकवादी' कहा जा सकता है?
इतनी जानकारी मिलते तक उत्सुकता और बढ़ चुकी थी.
लक्ज़मबर्ग सरकार के प्रेस और सूचना विभाग और इस पोस्टर को जारी करने वाली संस्था की वेबसाइट से जो जानकारी मिली उससे एहसास हुआ कि दुनिया भर में महात्मा गाँधी अब भी कितने प्रासंगिक हैं.
दरअसल, लक्ज़मबर्ग की सरकार 'आतंकवाद' के ख़िलाफ़ एक क़ानून बना रही थी और इस क़ानून के कुछ प्रावधानों के ख़िलाफ़ एक आंदोलन खड़ा हो गया था.
विरोध करने वालों का कहना था कि असहमति या विरोध प्रदर्शन को 'आतंकवाद' नहीं कहा जा सकता.
इस संस्था का कहना था कि अहिंसापूर्ण नागरिक आंदोलनों को क़ानूनी मान्यता मिलनी चाहिए.
अपनी बात रखने के लिए महात्मा गाँधी का पोस्टर बनाने वाले लोगों की माँग थी कि सामाजिक आंदोलन को 'आतंकवाद' नहीं कहा जा सकता.
वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आज़ादी की हिमायत कर रहे थे.
कुल साढ़े चार लाख की आबादी वाले छोटे और समृद्ध देश लक्ज़मबर्ग में अब भी राजशाही है.
लक्ज़मबर्ग सरकार का कहना है कि यह क़ानून जुलाई में पारित कर दिया गया है और क़ानून के कुछ प्रावधानों को दुरुस्त किया गया है.
क्या यह आपको महात्मा गाँधी की एक और जीत की तरह नहीं लगता? |
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इंटरनेट लिंक्स
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लक्ज़मबर्ग सरकार |
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