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बुधवार, 06 अगस्त, 2003 को 19:06 GMT तक के समाचार सेक्स के सवाल पर संकोच
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क़रीब दस साल पहले जब खलनायक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो 'चोली के पीछे क्या है...' गीत पर फ़िल्माए गए माधुरी दीक्षित के डांस ने लोगों का ध्यान खींचा था.
ये गाना बहुत हिट हुआ था. लेकिन सरकारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस पाबंदी लगा दी थी.
फ़िल्म ख़्वाहिश में सत्रह चुंबन होने को भी बहुत चटख़ारे लेकर भुनाया गया था.
शादी से पहले शारीरिक संबंध पर आपत्ति, क्या बकवास है? विवाह के बाहर शारीरिक संबंध मध्यम वर्ग मे ही नही बल्कि हर वर्ग मे मिलते हैं | | इंदौर की अवंतिका | कुछ समय पहले तक भारतीय फ़िल्मों में चुंबन की जगह दो फूलों का टकराना या दो चिड़ियों का चोंच लड़ाना ही दिखाया जाता था.
हाँ फूहड़ बोलों, कूल्हे मटकाने और अश्लील द्विअर्थी संवादों पर कोई रोक नही थी.
सेक्स के बारे में भारतीय मध्यम वर्ग के विचारों में भी इसी तरह के अंतर्विरोध नज़र आते हैं.
शारीरिक संबंधों पर पाखंड
समलैंगिकता, विवाह पूर्व और विवाहेतर संबंध आम बात हैं लेकिन आधुनिक भारतीय पुरूष अभी भी मानता है कि वो शादी एक वर्जिन यानी कुँआरी कन्या से ही करेगा.
भोपाल के विपिन गोयल कहते हैं, '' पहले मै ऐसा ही सोचता था लेकिन अब ऐसा नही है. पहले आपके दिमाग में भरा जाता था कि आपकी पत्नी पवित्र और सती-सावित्री होनी चाहिए. ''
दिल्ली मे द्वितीय वर्ष की छात्रा भूमिका पूछती हैं कि जब लड़के विवाह से पूर्व यौन संबंध स्थापित कर सकते हैं तो लड़कियाँ क्यों नहीं?
इंदौर की अवंतिका लाहिरी भी उतनी ही आक्रामक मुद्रा अपनाती हैं, '' प्रीमेरिटल सेक्स, क्या बकवास है. आप वर्जिन मेट्स की बात करते हैं, क्या आप वर्जिन हैं? विवाहेतर संबंध मध्यम वर्ग मे ही नही बल्कि हर वर्ग मे मिलते हैं. ''
समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता मानते हैं- '' भारत मे अगर आदमी अपने बीवी-बच्चों को ख़ुश रखता है तो उसे ये सब करने की छूट रहती है. लेकिन अमरीका मे ये सब नही चलता है. आपको तलाक देना पड़ता है, लेकिन भारत मे तलाक देना बुरा समझा जाता है.''
नैतिक मूल्य?
विवाह पूर्व यौन संबंधों को जायज़ ठहराने के लिए नैतिक मूल्यों का सहारा लिया जाता है और कहा जाता है कि अगर कमिटमेंट है तो इसमे कोई बुराई नही.
आपके दिमाग मे भरा जाता था कि आपकी पत्नी पवित्र और सती सावित्री होनी चाहिए | | भोपाल के विपिन | लखनऊ के अमोल मिश्र कहते हैं, '' ये आपके पार्टनर पर निर्भर करता है. अगर उसे कोई आपत्ति नही है तो आप आगे बढ़ सकते हैं. अगर आप जीवन भर साथ देने का वादा करें तो इसमे कोई आपत्ति नही है. लेकिन अगर ये वासना की वजह से है तो मै इसका समर्थन नही करूँगा. ''
मध्यम वर्ग मे स्त्री-पुरूष संबंध अभी भी पुरूषवाद के दुर्ग हैं.
मियाँ और बीवी अगर साथ-साथ दफ़्तर से वापस घर लौटते हैं तो मियाँ मेज़ पर पैर फैलाकर अख़बार पढ़ता है और बीवी से उम्मीद रखता है कि वो फेंटा कसकर रसोई मे जाए और उसके लिए चाय बनाए.
दैनिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे मानती हैं कि इस क्षेत्र मे तीन-चौथाई हिंदुस्तानी मध्यमवर्गी बहुत पाखंडी हैं. सेक्स के बारे मे खुल कर बात नही करते.
हमारे यहाँ अभी भी ज़्यादातर मध्यमवर्गी लड़के लड़कियाँ तयशुदा शादियाँ करते हैं.
लड़कों से पूछा जाए तो वो कहेंगे कि फ़्लर्ट करने के लिए ऐसी-वैसी लड़कियाँ ठीक हैं लेकिन हम शादी ऐसी लड़की से करेंगे जो घर-गृहस्थी चलाए, माँ बाप की सेवा करे और वफ़ादार रहे.
सेक्स के प्रति लोगों के नज़रिए मे पहले की तुलना मे लचीलापन आया है लेकिन खुलेआम अपनी सेक्सुएलिटी पर चर्चा करने मे वो अभी भी शर्माता है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के डॉक्टर पुष्पेष पंत कहते हैं, '' बच्चे खुलेआम मानने को तैयार हैं कि यहाँ अमरीका की तरह किसिंग न होती हो लेकिन हाथ-वाथ वो चैन से फेर ही लेते हैं अपनी पसंदीदा दोस्त पर."
वे कहते हैं, "अभी भी मुझे लगता है कि जहाँ तक समलैंगिक संबंधों की बात है, अपने किसी पुरूष या महिला मित्र के साथ विवाह से पहले सेक्स की बात है, उसे वो क़बूल करने से घबराते हैं. लेकिन अब ये बदल रहा है.'' |
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