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सोमवार, 04 अगस्त, 2003 को 14:30 GMT तक के समाचार जीवन शैली, आकाँक्षाएं और मूल्य
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घर के बजाय रेस्टोरेंट का फास्ट फूड ज़्यादा पसंद बनने लगा है
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मध्यम वर्ग की जीवन शैली को बड़ी कंपनियों के विज्ञापन अभियानों ने बख़ूबी भुनाया है.
चाहे वह पेप्सी का "ये दिल माँगे मोर" हो या फिर कोका कोला का "जो चाहो हो जाए- कोका कोला एंजॉय" या फिर नाइके का "जस्ट डू इट", मध्यम वर्ग की दुनिया में नाकामी को बहुत हिरारत की नज़र से देखा जाता है.
शायद इसी वजह से आई है दिन में 16 घंटे काम करने की संस्कृति.
इसके पीछे सोच ये है कि आगर आप लगातार दौड़ते नहीं रहेंगे तो अपनी जगह खो बैठेंगे.
इंदौर की एक विज्ञापन कंपनी की एक वरिष्ठ अधिकारी उस समय बिल्कुल हतप्रभ रह गईं जब उनके नीचे काम कर रही कॉलेज से अभी-अभी निकली एक 20 वर्षीय बाला ने बिना शर्म और संकोच के कहा कि वो उनकी जगह पर नौकरी करना चाहती है.
मसलन आप अंग्रेज़ी कैसे बोलते हैं, आपका एक्सेंट कैसा है, चाय कैसे पीते हैं - आवाज़ करके पीते हैं या चुपचाप, काँटे-छुरी से खाना खा सकते हैं या नहीं, आपकी टाई नॉट कैसी बंधी है. | | प्रोफ़ेसर दीपाँकर गुप्ता | करियर के रास्तों को कुछ इस तरह बनाया जा रहा है कि 30 की उम्र तक आप बीच के स्तर पहुँच जाएँ और 35 तक आते-आते चोटी की कुर्सी के ख़्वाब देखने लगें.
बड़े-बड़े सपने
भोपाल में रहने वाले विपिन गोयल ने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. वह एक स्टील रोलिंग मिल चलाते हैं.
पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका ये सपना था कि जब वो 30 साल के हो जाएं तो उनके पास कम से कम एक करोड़ रूपया हो, एक बढ़िया बीवी, एक अच्छी कार और एक अच्छा घर हो और उनके ये सपने कब के पूरे भी हो चुके हैं.
लखनऊ के यूनिटी कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ा रही राशि बडालिया एक अच्छे जीवन साथी और घर को सबसे ज़्यादा अहमियत देती हैं.
आईआईटी-रूड़की से औद्योगिक इंजीनियरिंग कर के निकले समीर शुक्ला सीएमसी में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर हैं.
उनका सपना है कि उनके पास एक बीएमडब्ल्यू कार हो और एक प्लश अपार्टमेंट हो, वो क्रूज़ पर केरिबियन घूमने जाएँ.
भारतीय मध्यम वर्ग में संदर्भ में 'यप्पीज़' और 'डिंक' की अवधारणाएँ सामने आई हैं.
'यप्पीज़' यानि यंग अरबन प्रोफ़ैशनल या शहर में रहने वाला युवा, ख़ुशहाल पेशेवर, जो ख़ूब पैसा ख़र्च कर सकता है और जिसकी पसंद-नापसंद के आधार पर अरबों रूपए का उत्पादन तय किया जाता है.
'डिंक' का मतलब है - डबल इन्कम, नो किड्स यानि दोहरी कमाई, बच्चे नदारद वाला परिवार.
लेकिन इनमें भी औरत को बराबरी का दर्जा देने को कितने मध्यम वर्ग परिवार और पति तैयार हैं?
पत्नी कमाए तो अच्छा है लेकिन नौकरी ऐसी करे जो पद प्रतिष्ठा में पति से क़तई बेहतर नहीं बैठती है.
ऊपर की ओर बढ़ने की क़वायद में लगा हुआ मध्यम वर्ग कुछ स्नॉब मूल्यों को भी पालता है.
दिखावट की ललक
जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय के प्रोफ़ेसर दीपाँकर गुप्ता मानते हैं कि इसका अर्थ है जीवन में जो कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है उसको एक फ़ाइन आर्ट में परिवर्तित करना.
जंक फूड अब इनका मुख्य भोजन बन गया है. पिज़्ज़ा, नूडल्स और बर्गर ने मध्यम वर्ग के घरों में अपनी जगह बना ली है, अब तो ढाबों से भी गरम-गरम चीनी खाना पैक कराया जा सकता है. | | | "मसलन आप अंग्रेज़ी कैसे बोलते हैं, आपका एक्सेंट कैसा है, चाय कैसे पीते हैं - आवाज़ करके पीते हैं या चुपचाप, काँटे-छुरी से खाना खा सकते हैं या नहीं, आपकी टाई नॉट कैसी बंधी है."
दीपाँकर गुप्ता का मानना है कि ये लोग स्नॉब इसलिए होते हैं क्योंकि ये चाहते हैं कि ये दूसरों से अलग दिखें.
भारतीय मध्यम वर्ग खाता क्या है?
एक ज़माने में एक रसोई होती थी और एक परिवार होता था. ब्रहम वाक्य था - "परिवार जो साथ खाते हैं, साथ रहते हैं."
मैक्डोनल्ड्स के उदय ने मध्यम वर्ग के स्वाद और खाने की आदतों में आमुल परिवर्तन किए हैं.
जंक फूड अब इनका मुख्य भोजन बन गया है. पिज़्ज़ा, नूडल्स और बर्गर ने मध्यम वर्ग के घरों में अपनी जगह बना ली है, अब तो ढाबों से भी गरम-गरम चीनी खाना पैक कराया जा सकता है.
ख़रीदारी को इलाज या थैरेपी के रूप में मध्यम वर्ग के सामने पेश किया जा रहा है.
दिल्ली की सीमाओं से लगी नई आबादी में कुछ टाउनशिप ये विज्ञापन भी देती हैं कि उनके यहाँ कुछ भी भारतीय नहीं है.
सेटेलाइट टेलीविज़न ने दुनिया की खिड़कियाँ कुछ इस तरह खोली हैं कि आप चाहें मुरादाबाद में हों, या गुना में या कोटा में, फ्रेंड्स, बे वॉच, बोल्ड एंड द ब्यूटीफुल से लेकर कोई भी धारावाहिक या फ़िल्म अपने टेलीविज़न स्क्रीन पर देख सकते हैं.
लेकिन अच्छी जीवन शैली का मूल्य भी चुकाना पड़ता है और वो अनिश्चितता और अस्थिरता. और शायद यही कारण है कि अत्याधुनिक दफ़्तरों में स्टेट ऑफ़ आर्ट कंप्यूटरों पर भी प्रिय गुरुओं के चित्रों के स्टीकर चिपके नज़र आते हैं.
हर मंगलवार को हनुमान मंदिर के सामने लाँसर, प्रादा और ओपेल जैसी कारों की क़तारें लगी होती हैं.
ये वही लोग हैं जो शाम को पब या क्लबों में भी जाते हैं. |
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