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सोमवार, 04 अगस्त, 2003 को 14:25 GMT तक के समाचार
मध्यम वर्ग का दायरा
जयपुर का सिटि सेंटर : मध्यम वर्ग का आकर्षण केंद्र
जयपुर का सिटि सेंटर : मध्यम वर्ग का आकर्षण केंद्र



एक ज़माने में कहा जाता था कि एक आम भारतीय व्यक्ति मध्यम वर्ग में तब दाख़िल होता था जब उसके पास पाँव में पहनने के लिए जूते आ जाते थे.

अब इस नज़रिए में बदलाव आया है.

अब तो नंगे पाँव चलने को एक तरह का फ़ैशन भी माना जा सकता है.

भारत में मध्यम वर्ग की अवधारणा पश्चिम से आई है.

साम्यवादी तो मध्यम वर्ग का ज़िक्र ही नहीं करते थे, वो या तो बुर्जुआ की बात करते था या प्रोलिटेरियट की.

पश्चिम ने ज़ोर दिया कि इन दोनों के बीच का भी एक वर्ग है - मध्यम वर्ग.


इस वर्ग ने परंपरा को भी तजा नहीं है और इन पर पाश्चात्यीकरण भी छाया हुआ है. इनमें शामिल हैं आईएएस अफ़सर, डिफ़ेंस में काम करने वाले और कॉलेज के प्रोफ़ेसर और इनमें भी एक तरह की हायरारकी बनी हुई है.

समाजशास्त्री योगेश अटल
मध्यम वर्ग के लोगों की भी एक ख़ास आदत है कि वो बिना समय गँवाए ख़ुद को निम्न मध्यम वर्ग, मध्य मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग में बाँट लेते हैं और भारतीय शहरों में हैसियत के चिन्हों का जायज़ा लेकर लोगों को इन श्रेणियों में रखा जा सकता है.

मसलन आपके पास फ्लैट स्क्रीन कलर टेलीविज़न है या साधारण टेलीविज़न, आपके पास किस ब्रांड की कार है, नक़द ली है या क़िस्तों पर, आपका घर शामला हिल्स, वसंत विहार, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में है या बाड़गंगा, नांगलोई या उत्तम नगर में है?

आपके घर में फुल टाइम नौकर है या पार्ट टाइम? आपके बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं या सरकार स्कूल में? आप छुट्टियाँ मनाने अपने रिश्तेदार के पास जाते हैं या गोवा या थाइलैंड के किसी टूरिस्ट रिज़ॉर्ट पर?

दायरा

यूनेस्को के पूर्व निदेशक और जाने माने समाज शास्त्री योगेश अटल मानते हैं कि मध्यम वर्ग मूलतः एक सर्विस क्लास है, किसान नहीं है, गाँव का नहीं है, शहरी है.

"इस वर्ग ने परंपरा को भी तजा नहीं है और इन पर पाश्चात्यीकरण भी छाया हुआ है. इनमें शामिल हैं आईएएस अफ़सर, डिफ़ेंस में काम करने वाले और कॉलेज के प्रोफ़ेसर और इनमें भी एक तरह की हायरारकी बनी हुई है."


ये लोग कार रखते हैं, बड़े-बड़े शहरों में रहते हैं, अंग्रेज़ी बोलते हैं, इनको सीधे-सीधे भद्रलोक कहना चाहिए, हिंदुस्तान की रूलिंग क्लास कहना चाहिए, ये तो शासक हैं, इस देश के.

योगेंद्र यादव
योगेश अटल कहते हैं, "हमारे यहाँ एक तरफ़ जाति का संस्तरण है तो दूसरी तरफ़ वर्ग का संस्तरण है. फ़र्क़ इतना है कि जाति का फ़र्क़ जन्म से आता है जबकि वर्ग का फ़र्क़ प्रतियोगिता से आता है."

दूसरी तरफ़ समाजशास्त्रियों का एक वर्ग इस दरमियाना तबके के लोगों की संख्या बहुत कम आँकता है.

राजनीतिक विश्वेषक योगेंद्र यादव सोचते हैं कि भारत में चोटी में बैठे हुए जो चार पाँच फ़ीसदी लोग हैं वो अपने आपको अमीर कहने के बजाय ख़ुद को मीडियम क्लास कहलाना पसंद करते हैं.

"ये लोग कार रखते हैं, बड़े-बड़े शहरों में रहते हैं, अंग्रेज़ी बोलते हैं, इनको सीधे-सीधे भद्रलोक कहना चाहिए, हिंदुस्तान की रूलिंग क्लास कहना चाहिए, ये तो शासक हैं, इस देश के."

योगेंद्र यादव कहते हैं कि यहाँ भारत और आधुनिक पश्चिमी समाज के मध्यम वर्ग में फ़र्क़ किया जाना ज़रूरी है.

"मध्यम वर्ग को एक बहुत उपभोक्ता वर्ग मानने वाले लोग भी मानेंगे कि भारत में अब भी एक अरब लोगों में सिर्फ़ छह करोड़ लोगों के पास टेलीविज़न हैं, क़रीब 20 करोड़ लोग अपनी कलाइयों में घड़ी पहनते हैं और एक हज़ार लोगों में सिर्फ़ तीन लोगों के पास कार है जबकि अमरीका में एक हज़ार में से 214 लोग कार रखते हैं."

पश्चिम से फ़र्क़

समाज शास्त्र के प्रोफ़ेसर दीपाँकर गुप्ता मानते हैं कि भारत का मिडिल क्लास कार और टेलीविज़न जैसी चीज़ों को ज़िंदगी में एक या दो बार ख़रीदता है जबकि उसके पास ऊँचे उत्पादन की खपत के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन नहीं हैं.

"यही कारण है कि भारत की सड़कें उस तरह की कारों से भरी पड़ी हैं जिन्हें सालों पहले कबाड़ख़ाने के हवाले कर दिया जाना चाहिए था."


खाने की पश्चिमी आदतें
प्रोफ़ेसर दीपाँकर गुप्ता का ख़याल है कि भारत में खाते-पीते चुनिंदा लोग अपने आप को मध्यम वर्ग कहते हैं जबकि पश्चिम में पूरी की पूरी आबादी ही मध्यम वर्ग में आती है. उसकी सामाजिक ज़मीन इतनी पुख़्ता होती है कि उसमें ऊँचे लोगों के साथ अपने कनेक्शन जताने की नौबत नहीं आती है.

एक और समाजशास्त्री नदीम हसनैन मानते हैं कि भारत का मध्य वर्ग अधिकतर उच्च जातियों से आता है, पढ़ा-लिखा है, ये एक तरह से पैरासाइट है जो अपनी मेहनत से नहीं बल्कि दूसरे की मेहनत से फलता-फूलता है.

"आकाँक्षाएँ बहुत बड़ी हैं लेकिन इनको पूरा करने के लिए जो एंटरप्राइज़ उसमें होनी चाहिए वो न उसमें है और न वो उसके लिए प्रयास करता है."

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पुष्पेष पंत भी इससे कोई ज़्यादा भिन्न राय नहीं रखते.

उनका कहना है, "आज का मिडिल क्लास सब कुछ हासिल करना चाहता है, अपने अलावा किसी के लिए कुछ छोड़ना नहीं चाहता और पुराने मिडिल क्लास के जो मूल्य थे - क़िफ़ायत के, बचत के, ईमानदारी के, कड़ी मेहनत के - उनसे वो अपना हाथ कब का खींच चुका है.

"आज का मिडिल क्लास जितनी जल्दी हो सके अपनी क्लास को लात मारकर पहले उच्च मध्यम वर्ग और फिर उच्च वर्ग में पहुँचना चाहता है."
 
 
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