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शनिवार, 02 अगस्त, 2003 को 17:34 GMT तक के समाचार 'भारत में दहेज प्रथा बढ़ी है'
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कुछ महिलाएं दहेज को पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मानती हैं
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भारत में एक महिला संगठन का कहना है कि शिक्षा, जागरूकता और सख़्त क़ानूनों के बावजूद दहेज प्रथा घटने के बजाय और बढ़ी है.
अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति एक सर्वेक्षण के बाद एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसमें बदलते दौर में भी दहेज की स्थिति का जायज़ा लिया गया है.
संगठन ने 17 राज्यों में सर्वेक्षण करने के बाद पाया है कि दहेज प्रथा पिछले चार दशकों में उन इलाक़ों और लोगों में भी बढ़ी है जिनमें पहले नहीं हुआ करती थी.
 निशा ने आवाज़ उठाई थी | ग़ौरतलब है कि भारत में दहेज प्रथा को एक सामाजिक कुरीति माना जाता है जिसका शिकार ख़ासतौर से महिलाएं होती हैं.
संगठन ने अपनी पुस्तक - 'एक्सपेंडिंग डाइमेंशंस ऑफ डाउरी' में लिखा है कि सर्वेक्षण में क़रीब दस हज़ार लोगों से बातचीत की गई.
संगठन की महासचिव वृंदा कारत कहती हैं, "क़रीब 35% महिलाओं ने इस दलील के साथ दहेज की हिमायत की कि उन्हें भी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए."
पैर फैलाए
क़िताब में कहा गया है कि 1970 के दौर में महिलाओं की स्थिति और महिला आंदोलन के बारे में बनी समिति ने कहा था कि दहेज लेना और देना हिंदू समुदाय में तो प्रतिष्ठा का एक प्रतीक माना जाता रहा है लेकिन अब यह अन्य समुदायों में भी फैलने लगा है.
"तब से दहेज प्रथा ने हिंदू, मुसलमान, ईसाई और आदिवासी मध्यवर्गीय और निम्न जातियों के लोगों में भी अपने पैर फैला दिए हैं."
पुस्तक इस विचार को रद्द करती है कि दहेज पैतृक संपत्ति में अपने बराबर के अधिकार लेने का एक तरीक़ा हो सकता है.
इसमें कहा गया है कि दहेज प्रथा से छुटकारा पाने में अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देकर मदद मिल सकती है.
इसी वर्ष मई में निशा शर्मा की एक युवती ने दहेज के मुद्दे पर शादी करने से इनकार कर दिया था लेकिन ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती हैं.
महिलाओं के कल्याण के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं का कहना है कि दहेज प्रथा का मुक़ाबला करने के लिए क़ानूनों को सख़्ती से लागू किया जाना और व्यापक अभियान चलाया जाना ज़रूरी है. |
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