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बुधवार, 30 जुलाई, 2003 को 14:24 GMT तक के समाचार बड़ा परिवार बना रूकावट
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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के कानून को सही ठहराया
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भारत में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को सही ठहराया है जिसके तहत हरियाणा के पंचायत चुनाव में कोई भी ऐसा व्यक्ति उम्मीदवार नहीं हो सकता जिसके दो से अधिक बच्चे हों.
लगभग नौ साल पहले राज्य विधानसभा में पारित इस कानून के बाद कई समूहों और ख़ास तौर पर मुसलमानों की ओर से इसका विरोध हुआ था.
इन समूहों का कहना है कि इससे उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है.
मगर विशेषज्ञों ने न्यायालय के इस फ़ैसले का स्वागत किया है.
उनका कहना है कि इससे राजनीतिज्ञों को देश की बढ़ती जनसंख्या रोकने के बारे में आगे बढ़कर नेतृत्व करने में मदद मिलेगी.
इस बारे में उच्चतम न्यायालय ने 200 से भी अधिक याचिकाएँ खारिज कर दीं.
न्यायालय का कहना है कि ये कानून भारतीयों के मौलिक अधिकारों का किसी भी तरह उल्लंघन नहीं करता.
पूरा स्पष्टीकरण
उच्चतम न्यायालय का कहना है कि ऐसे माँ-बाप जिनकी दो से ज़्यादा संतानें हों तो वे अपने बच्चों को दूसरों के हवाले करके भी इस क़ानून से नहीं बच सकते.
चुनाव लड़ना किसी का मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता | | सोली सोराबजी | ये उल्लेख न्यायालय ने तब किया जब उन्हें ध्यान दिलाया गया कि कुछ गाँवों में जहाँ मुसलमान सरपंच हैं वहाँ अगर उनकी तीसरी संतान है तो उन्होंने उसे किसी को सिर्फ़ दिखाने के लिए गोद दे दिया है.
मगर जजों ने उन लोगों को माफ़ी दे दी है जिनकी दूसरी संतान जुड़वाँ हो.
लगभग नौ साल पहले आए इस कानून का ख़ास तौर पर मुसलमान संगठनों ने विरोध किया है.
उनका कहना है कि ये कानून इस्लामी कानून शरिया के विरुद्ध है.
इन संगठनों के अनुसार इस्लाम उन्हें चार पत्नियाँ रखने की अनुमति देता है और हर पत्नी से उनके एक संतान हो तो उनकी चार संतानें हो जाती हैं.
उनका कहना है कि इसकी वजह से वे अपने-आप ही चुनाव मैदान से बाहर हो जाएँगे.
उल्लंघन नहीं
इस पर महाधिवक्ता सोली सोराबजी ने कहा कि ये कानून किसी को संतानें पैदा करने से नहीं रोकता मगर उन्हें सिर्फ़ सरपंच बनने से रोकता है.
उनका कहना था कि चुनाव लड़ना किसी का मौलिक अधिकार नहीं हो सकता.
महाधिवक्ता ने कहा कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण ग्राम पंचायत की ज़िम्मेदारी है और जो लोग उसमें चुने जाते हैं ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों के सामने उदाहरण पेश करें.
कुछ कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मकसद देश की बढ़ती जनसंख्या को रोकना है न कि किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना.
इस कानून का पक्ष लेने वाले वकील सूरत सिंह ने कहा कि इस फ़ैसले का भारतीय लोकतंत्र पर दूरगामी असर होगा.
उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अब इस पर सहमति दे दी है तो केंद्रीय और अन्य राज्य सरकारें सांसदों और विधायकों पर भी ये लागू कर सकती हैं.
विश्लेषकों के अनुसार इसका राजनेताओं पर ख़ासा असर हो सकता है. |
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