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शनिवार, 26 जुलाई, 2003 को 10:58 GMT तक के समाचार
महिलाओं का अनोखा प्रयोग
महिलाओं ने अपनी सहायता के लिए ख़ुद ही ये केंद्र बनाया
महिलाओं ने अपनी सहायता के लिए ख़ुद ही ये केंद्र बनाया

ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि गाँव की अनपढ़ महिलाएँ ढाई करोड़ रुपया इकट्ठा करके कोई संगठन बनाएँ और उसे चलाएँ.

लेकिन यह काम कर दिखाया है भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के राजनाँदगाँव ज़िले की महिलाओं ने.

यहाँ महिलाओं ने माँ बामलेश्वरी समूह नाम से एक स्वसहायता केंद्र बनाया है और ढाई करोड़ रुपया इकट्ठा करके ठेकेदारों, साहूकारों और बिचौलियों को एक तरफ़ करके अपने जीवन की कमान अपने हाथों में ले ली है

उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए मछली पालन जैसे पेशों के लिए क़र्ज़ देने की योजना भी शुरु करदी है.

जागरुक

साथ ही ये महिलाएँ अपने बच्चों के पालन पोषण और शिक्षा के बारे में भी जागरुक हैं .


महिलाओं ने तो साइकिल चलाना भी सीख लिया है
इनमें से एक कोरीकासा में माँ बामलेश्वरी समूह की मुखिया हैं.

उनका कहना है, "हमने सोचा बामलेश्वरी समूह बनाया जाए ताकि हमारा कुछ विकास हो, हम कुछ कर सकें. जब हमें पैसों की ज़रुरत होती थी तो हमें सेठ साहूकारों के पास जाना पड़ता था, अपने गहने गिरवी रखने पड़ते थे.

साथ ही वह यह भी कहती हैं कि अब हालात बदल गए हैं.

"अब किसी को पैसों की ज़रुरत होती है तो उसे हम उधार दे देते हैं, तीन रुपए ब्याज पर हम अपनी सहायता खुद करते हैं. "

आज न केवल राजनाँदगाँव बल्कि छत्तीसगढ़ के दूसरे ज़िलों में भी ऐसे समूह क़ायम किए गए हैं.

राजनाँदगाँव के ज़िला कलेक्टर दिनेश श्रीवास्तव का कहना है, "जब तक गाँव के लोगों की साझेदारी नहीं होगी कोई योजना सफल नहीं हो सकती".

"माँ बामलेश्वरी स्वसहायता आंदोलन में आज लगभग सात हज़ार महिला स्वसहायता समूह हैं जिनमें एक लाख बीस हज़ार महिलाएँ है और वे अपनी व्यवस्थाएँ खुद करती हैं".

दिनेश श्रीवास्तव कहते हैं, "ये महिलाएँ 10-15 रुपए जोड़कर बैंक में जमा कराती हैं इसी तरह इन्होंने ढाई करोड़ रुपए इकट्ठा किए हैं."

स्वसहायता समूह से जुड़ी महिलाएँ क़र्ज़ लेने देने के अलावा छोटे व्यापार भी चलाती हैं.

यहाँ के राजघराने की पुश्तैनी ज़मीन जो अब एक ट्रस्ट का हिस्सा है महिलाएँ उसे किराए पर लेकर वहाँ फ़सल उगाती हैं और मछली पालन कर परिवार चलाती हैं.

गाँव में बड़ी उम्र कई महिलाओं ने तो अब साईकिल चलाना भी सीख लिया है.

एक महिला का कहना है, "हम मछली पालते हैं और अब तो हमने साईकिल चलाना भी सीख लिया है, इसलिए अब हम किसी पर निर्भर नहीं हैं हम खुद साईकिल चलाकर अपनी मछली बाज़ार में बेच आते हैं

साथ ही ग़रीब अनाथ लड़कियों को दत्तक पुत्री बनाने और बच्चों के स्वास्थ्य तथा शिक्षा पर भी ये महिलाएँ काफ़ी ध्यान दे रही हैं.

शराबबंदी

इनके कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शराबबंदी है. पुरुष इसे पसंद करें या न करें पर ये महिलाएँ करती हैं.

अपने आज के प्रति सजग और अपने कल को सुंदर बनाने में जुटी इन महिलाओं की जीवन शैली काफ़ी बदल गई है और आत्म विश्वास बढ़ा है.

कोरीकासा गाँव के सरपंच सिंह करम तो मानते है कि इन महिलाओं ने तो उनका काम भी आसान कर दिया है.

उनका कहना है, "अब चाहे हाट बाज़ार लगाना हो, ग्रामीण ओलम्पिक में भाग लेना हो या फिर माँ बामलेश्वरी का गुणगान करना हो उन्हें किसी काम के लिए भी किसी की ओर देखने की ज़रुरत नहीं पड़ती."

सिंह करम कहते हैं, "यहाँ पर दारु की भट्टी बंद करा दी गई है.महिला समूह की सदस्य हमारी सहायता करती हैं.गाँव में जितना भी विकास हो रहा है उसमें उनका अच्छा योगदान है, में भी उनकी मदद करता हूँ".
 
 
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