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रविवार, 20 जुलाई, 2003 को 12:36 GMT तक के समाचार
अस्पताल के सहारे जुड़वाँ बच्चे
माँ-बाप ने इन बच्चों कों अस्पताल के सहारे पर ही छोड़ा है
माँ-बाप ने इन बच्चों कों अस्पताल के सहारे पर ही छोड़ा है

उन्हें देखकर पहला एहसास तो यही होता है कि क़ुदरत ने उनके साथ ख़तरनाक मज़ाक किया है.

कहावत है कि संतान किसी भी माँ-बाप के दिल का टुकड़ा होती है लेकिन कभी-कभी बच्चों को पालना आसान काम नहीं होता.

इस मामले में तो यही हुआ है कि माँ-बाप उन्हें अपने साथ नहीं रख सकते क्योंकि उनकी हालत बहुत नाज़ुक है.

दिल्ली में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टर डीके गुप्ता इन बच्चों की देखरेख कर रहे हैं.


"अलग करना संभव नहीं"
उनका कहना है कि इन बच्चों को अलग करने के लिए ऑपरेशन बिल्कुल कामयाब नहीं हो सकता क्योंकि वे बहुत ही जटिल तरीक़े से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

इस जटिलता की वजह से उनके ज़िंदगी जीने में बहुत मुश्किल होगी और इसी वजह से उनके माता-पिता ने भी सारा फ़ैसला डॉक्टरों पर छोड़ दिया है.

इन बच्चों का जन्म लगभग एक महीने पहले हुआ है. ये बच्चे धड़ से इस तरह जुड़े हुए हैं कि उनके दो सिर हैं, चार हाथ हैं, दो दिल हैं लेकिन टाँगें सिर्फ़ दो ही हैं.

डॉक्टरों का तो यही कहना है कि बच्चे अभी स्वस्थ हैं और उनका वज़न क़रीब साढ़े तीन किलोग्राम है.

डॉक्टर गुप्ता का कहना है कि दोनों टाँगों का अलग-अलग संपर्क दोनों दिमाग़ों से है इस तरह "अगर ऑपरेशन के बारे में सोचा भी जाए तो एक बच्चे के हिस्से में एक ही टाँग आएगी."

इसके अलावा ऑपरेशन से बच्चों का आकार भी बिगड़ सकता है.

भारतीय समाज में कुछ ऐसे अंधविश्वास प्रचलित हैं जिनके तहत ऐसे बच्चों को ईश्वर का प्रकोप समझा जाता है.

जुड़वाँ

दुनिया में पैदा होने वाले दो लाख बच्चों में एक पैदाइश ऐसे जुड़वाँ बच्चों की होती है जो शारीरिक रूप से भी जुड़े हुए होते हैं.

इस तरह के जुड़वाँ बच्चों में से भी क़रीब 60 प्रतिशत तक जन्म से पहले ही मर जाते हैं और क़रीब 35 प्रतिशत जन्म के 25 घंटे तक ही जीवित रह पाते हैं.

जो ज़्यादा समय तक जीवित रहते भी हैं तो उनकी जटिलताएँ इतनी हो जाती हैं कि उनकी ज़िंदगी बहुत मुश्किल हो जाती है.

ईरान की जुड़वाँ बहनों का उदाहरण सारी दुनिया के सामने है जो सिर से जुड़ी हुई थीं और उन्होंने इसी रूप में 29 वर्ष की उम्र गुज़ार दी थी.

भारत के पश्चिम बंगाल की दो ऐसी बहनें हैं जो धड़ से जुड़ी हुई हैं और उनकी तीन टाँगें हैं. चलने-फिरने के लिए वे अपने हाथों का इस्तेमाल करती हैं.

लेकिन उन्होंने साफ़ कह दिया है कि अगर डॉक्टर उन्हें अलग करने के लिए सफल ऑपरेशन का भरोसा भी दिलाएँ तो वे अलग होने के बारे में नहीं सोचेंगी.
 
 
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