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शुक्रवार, 18 जुलाई, 2003 को 03:08 GMT तक के समाचार 'बच्चियाँ ज़्यादा मारी जाती हैं'
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बच्चियाँ ऐसे रोगों से भी मरती हैं जिनका इलाज संभव है
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भारत में बालक शिशु की अपेक्षा बालिका शिशुओं के मरने की संभावना ज़्यादा होती है और ऐसे रोगों में भी उनकी मौत हो जाया करती है जिनका इलाज संभव है.
ये दावा किया गया है एक शोध में जो ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
ये शोध दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस अस्पताल में किया गया.
इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बच्चियों की ये हालत शायद इस कारण है क्योंकि भारत में बेटी पैदा होना कम पसंद किया जाता है.
आमतौर पर दुनिया के ज़्यादातर देशों में महिलाओं और पुरूषों की जनसंख्या लगभग समान होती है मगर भारत में ऐसा नहीं है.
वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में हर 1000 पुरुष के पीछे 933 महिलाएँ हैं.
भारत में बच्चियों की भ्रुण हत्या की संख्या भी काफ़ी है.
शोध
 पाँच साल तक चला ये अध्ययन दिल्ली में किया गया | इस नए शोध में पाँच साल तक दिल्ली के तीन ऐसे इलाक़ों पर नज़र रखी गई जो सामाजिक तौर पर पिछड़े हैं.
इन इलाक़ों में इस अवधि में मारे गए सारे शिशुओं की रिपोर्टों का अध्ययन किया गया.
और ये पाया गया कि बालक बच्चों की तुलना में बालिका बच्चों की मौत तीन गुना ज़्यादा हुई.
एक मामला ऐसा पाया गया जिसमें मरने वाले चार शिशुओं में से तीन बच्चियाँ थीं.
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस मामले में हो सकता है इसमें कई मौतें ऐसी हों जब बच्चियों के माँ-बाप की जानबूझकर की गई लापरवाही से उनकी जान गई हो.
ऐसी मौतें जो गंभीर और लाइलाज बीमारियों के कारण हुईं उनमें दोनों की संख्या एक समान थी - जितनी बच्चियाँ मरीं उतने ही बच्चे भी.
लेकिन ऐसी मौतें जो डायरिया और ऐसी ही किसी दूसरी ऐसी बीमारी के कारण हुई जिनका इलाज संभव था, वहाँ स्थिति कुछ और थी.
ऐसे मामलों में देखा गया कि शिशु बच्चों की तुलना में शिशु बच्चियों के मरने की संख्या दोगुना थी. |
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