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सोमवार, 28 अप्रैल, 2003 को 22:57 GMT तक के समाचार
पढ़ाई के साथ भोजन
स्कूल में भोजन देने से उपस्थिति बढ़ रही है
स्कूल में भोजन देने से उपस्थिति बढ़ रही है

बच्चों को स्कूल में भोजन देने को लेकर भारत की राज्य सरकारें भारी दबाव में हैं.

कोई दस करोड़ बच्चों को प्रतिदिन भोजन देना होता है.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद राज्य सरकारों के लिए यह ज़रूरी हो गया है कि वे बच्चों को स्कूल में दोपहर का भोजन दें.

'मध्यान्ह भोजन' नाम की यह योजना बच्चों को पोषण देने और प्राथमिक शालाओं में उपस्थिति बढ़ाने के लिए लागू की गई है.

हालांकि यह योजना अभी एक हद तक ही लागू की गई है पर प्रेक्षकों का कहना है कि ज़रूरतमंद बच्चों को अब भी भोजन नहीं मिल पा रहा है.


भोजन की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते रहे हैं
देश की राजधानी दिल्ली के एक स्कूल में बच्चे हर दिन दोपहर को भोजन का पैकेट मिलने का इंतज़ार करते रहते हैं.

स्कूल ने जनवरी से हर बच्चे को 300 कैलोरी भोजन देना शुरू किया है.

ये स्कूल न्यायालय के उस आदेश का पालन कर रहे हैं जिसमें कहा गया है कि पाँच से दस बरस के हर बच्चे को पका हुआ भोजन दिया जाए.

फ़ायदा

एक स्कूल के शिक्षक महिपाल सिंह कहते हैं कि भोजन देने के बाद से स्कूल में बच्चों की उपस्थिति 15 फीसदी बढ़ी है.

वे कहते हैं, ''ज़्यादातर बच्चों को घर पर पूरा खाना नहीं मिल पाता इस लिहाज़ से यह उन्हें स्कूल में रोकने के लिए अच्छा है.''

उनका कहना है कि जब वे लौटकर और बच्चों को बताते हैं तो वे भी स्कूल आना चाहते हैं.

सात साल का संजू पहले घर से रोटी लेकर स्कूल जाता था पर अब वह स्कूल से अपनी बहनों के लिए खाना लेकर वापस आता है.

पर जहाँ योजना लागू हो गई है वहाँ नतीजे चौंकाने वाले हैं.

राजस्थान में स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति 25 फ़ीसदी बढ़ी है, जबकि लड़कियों की संख्या 35 प्रतिशत बढ़ी है.

इस योजना के तहत दस करोड़ से भी अधिक बच्चों को भोजन दिया जाना है.

हालांकि अब तक सिर्फ एक तिहाई बच्चों को ही भोजन मिल पा रहा है.

शिकायतें

तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने तो इस योजना में बड़ा काम किया है पर बिहार जैसे राज्य ने अभी शुरुआत भर की है.

भारत सरकार के सचिव और इस योजना के प्रभारी सुशील त्रिपाठी कहते हैं कि स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार दोनों ही इस योजना के लिए पैसों की कमी की शिकायतें कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार राज्यों को अनाज की सहायता कर रही है.

अड़चन

दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स की जीन ड्रेज़ का कहना है कि जाति प्रथा भी एक बड़ी बाधा है क्योंकि स्कूल में बच्चे एक साथ खाना खाते हैं.

वे कहते हैं कि राज्य सरकारों के लिए जनता के पैसे का इससे अच्छा उपयोग नहीं हो सकता.

जीन ड्रेज़ कहते हैं, ''इस योजना के लिए पैसा उपलब्ध करवाया जाना चाहिए.''

वैसे भोजन की गुणवत्ता भी मायने रखती है.

स्कूल में खाना खाने के बाद बीमार पड़ जाने की कुछ शिकायतों के बाद कुछ माता पिता चाहते नहीं कि बच्चे वहाँ खाना खाएँ.
 
 
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