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रविवार, 26 जनवरी, 2003 को 02:38 GMT तक के समाचार
ज़िंदगी अब भी पटरी पर नहीं
अनेक स्थानों पर मलबा अब भी ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है
अनेक स्थानों पर मलबा अब भी ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है



भारत के गुजरात राज्य के पश्चिमी कच्छ और भुज क्षेत्र में आए भूकंप को दो साल बीत चुके हैं लेकिन लोग उससे हुई तबाही से अब भी उबरने की कोशिश कर रहे हैं.

इन इलाक़ों का दौरा करने पर पता चलता है कि शहरी इलाक़ों में तो ज़िंदगी पटरी पर लौटती नज़र आ रही है लेकिन दूरदराज के इलाक़ों में हालात अब भी चिंताजनक हैं.

भुज के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में तो अब भी मलबा ज्यों का त्यों पड़ा देखा जा सकता है.


हालात बेहतर होने की बात सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही है

वसंत जोशी
भुज के क़रीब 2000 परिवार अब भी अस्थाई घरों में रहने के लिए मजबूर हैं.

दो साल पहले आए भूकंप के बाद से इस इलाक़े में कम से कम 1400 बार भूकंप के हल्के झटके महसूस किए जा चुके हैं.

बहुत से लोग तो तंग आकर ऐसे असुरक्षित मकानों में रह रहे हैं जिन्हें ढाँचा कहना ही बेहतर होगा और वे कभी भी भरभराकर गिर सकते हैं.

बड़े दावे

भुज के एक निवासी वसंत जोशी कहते हैं, "हालात बेहतर होने की बात सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही है."

"स्वैच्छिक संगठनों ने भी गाँवों पर ज़्यादा ध्यान दिया. क़स्बों और कुछ शहरों में हालात अब भी वैसे ही ख़राब हैं जैसे दो साल पहले थे."

अनेक निवासियों का कहना है कि राज्य सरकार ने भुज, अंजार और बछाऊ के लिए जो नई योजनाएं तैयार की हैं वे उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं क्योंकि उसके तहत मौजूदा घरों को ध्वस्त किए जाने की योजना है.

अनेक लोगों का यह भी कहना है कि भूकंप से प्रभावित जिन लोगों तक सहायता धनराशि भेजने का ऐलान किया गया था उनमें से बहुत के पास वह अभी तक नहीं पहुँची है.

हेराफेरी

लोगों का कहना है कि अधिकारियों ने जानबूझकर सर्वे रिपोर्टों में हेराफेरी की और जिन लोगों को सहायता राशि की ज़रूरत नहीं थी उन्हें ज़्यादा धनराशि दी गई है.

लेकिन राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग में एक अधिकारी निधि प्रभा तिवारी का कहना है कि ऐसी शिकायतों की निगरानी करने वाली स्थानीय संस्था ने 14 हज़ार मामलों का निबटारा अब तक कर दिया है.

निधि प्रभा तिवारी का यह भी कहना है कि ग्रामीण इलाक़ों में अब तक 85 प्रतिशत पुनर्निर्माण का काम अब तक पूरा किया जा चुका है और शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे कार्य की अनुमति दी जा चुकी है.

लेकिन ख़ास बात ये है कि नुक़सान सिर्फ़ संपत्ति का या भौतिक रूप से नज़र आने वाला ही नहीं है.


ख़तरा अब भी नहीं टला है
स्थानीय लोग शिकायत करते हैं कि भूकंप के बाद लोगों में अनेक मनोवैज्ञानिक बीमारियाँ भी घर कर गई थीं, हालाँकि दो साल का समय बीतने के साथ ही उनमें कुछ हद तक कमी भी आई है.

एक मनोचिकित्सक डॉक्टर संजीव गुप्ता कहते हैं कि ख़ासतौर से महिलाओं में अवसाद, हताशा, दुखी रहना, बेचैनी और भय जैसी बीमारियाँ घर कर गई हैं.

"इनमें से क़रीब दस प्रतिशत रोग सामान्य से आगे यानि चिंताजनक स्थिति में हैं."

डॉक्टर संजीव गुप्ता कहते हैं कि बच्चों में मनोवैज्ञानिक रोगों को कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए हैं और जो हैं भी उनका इलाज़ सामान्य चिकित्सक कर रहे हैं.

कुल मिलाकर लोगों का कहना है कि सरकारी एजेंसियों के मुक़ाबले स्वैच्छिक संगठनों ने कहीं ज़्यादा बेहतर कार्य किया है.

लेकिन लोग अब भी उम्मीद लगाए हुए हैं कि सरकार के रवैये में वक़्त के साथ कुछ परिवर्तन ज़रूर आएगा.
 
 
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