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रविवार, 19 जनवरी, 2003 को 11:32 GMT तक के समाचार मधुशाला' का चिराग़ बुझा
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हिंदी के साहित्यकार डॉक्टर हरिवंशराय 'बच्चन' का शनिवार को मुंबई में 96 वर्ष की आयु में देहांत हो गया है.
बच्चन के साथ ही हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हो गया है.
हरिवंश राय बच्चन पिछले पचास साल से भी अधिक समय से साहित्य सृजन में लगे रहे थे.
उनकी मशहूर कृतियों में 'मधुशाला' को सबसे ज़्यादा याद किया जाता है. आलोचकों ने मधुशाला की तुलना उमर ख़ैयाम की रुबाइयों से की है.
उनके पारिवारिक मित्रों ने पत्रकारों को बताया कि बच्चन की मृत्यु के समय उनकी पत्नी तेजी बच्चन, पुत्र अमिताभ बच्चन और पुत्रवधू जया बच्चन और परिवार के दूसरे सदस्य मौजूद थे.
स्वर्गीय बच्चन का अंतिम संस्कार रविवार को जुहू के श्मशान घाट पर किया जाएगा.
साहित्य साधना
मधुशाला की ये पंक्तियाँ लोगों की ज़ुबान पर थीं: "प्राणप्रिये यदि श्राद्ध करो तुम तो मेरा ऐसा करना, पीने वालों को बुलवाकर खुलवा देना मधुशाला".
बच्चन की आत्मकथापरक कृति 'क्या भूलूँ, क्या याद करूँ' ने भी उन्हें हिंदी साहित्य जगत में स्थापित किया. अन्य कृतियों में 'नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' आदि रहीं.
हरिवंशराय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था.
प्राणप्रिये यदि श्राद्ध करो तुम तो मेरा ऐसा करना, पीने वालों को बुलवाकर खुलवा देना मधुशाला | | मधुशाला | उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और फिर 1941 सो 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अँग्रेज़ी साहित्य विभाग में अध्यापन भी किया.
बाद में वे डॉक्टरेट करने इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुँचे जहाँ उन्होंने "डब्ल्यू बी यीट्स एंड ऑकल्टिज़्म" पर काम किया.
कैम्ब्रिज से लौटने के बाद बच्चन ने फिर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया और फिर कुछ समय के लिए आकाशवाणी में निर्माता के तौर पर काम किया.
तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से उनके घरेलू संबंध थे और नेहरू के कहने पर ही बच्चन ने 1955 में विदेश मंत्रालय में विशेष कार्याधिकारी की ज़िम्मेदारी सँभाली.
हिंदी भाषा और साहित्य को उनके योगदान के कारण बच्चन को 1966 में राज्यसभा में मनोनीत किया गया.
उन्हें पद्मभूषण, सरस्वती सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और अफ़्रीक़ी-एशियाई लेखकों का लोटस पुरस्कार भी दिया गया.
बाद में वे और उनकी पत्नी तेजी बच्चन अपने सिनेमा अभिनेता पुत्र अमिताभ बच्चन के साथ मुंबई में रहने लगे.
मधुशाला के साथ ही उनकी शुरूआती रचनाओं में मधुबाला और मधुकलश भी हैं. कुल मिलाकर हरिवंशराय बच्चन के क़रीब तीस कविता संग्रह प्रकाशित हुए.
इसके अलावा उन्होंने उमर ख़ैयाम की रुबाइयाँ, भगवद् गीता, यीट्स की कविताओं और शेक्सपियर की रचनाओं का भी हिंदी में अनुवाद किया.
आकलन
तीस-चालीस वर्षों तक वे मधुर काव्यपाठ के द्वारा लोगों को विभोर करते रहे. उन्होंने लोगों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अपनी कविताओं का स्तर कभी नहीं गिराया | | अजित कुमार | कई लोगों का मानना है कि हरिवंश राय बच्चन का एक साहित्यकार के तौर पर ठीक आकलन नहीं हो पाया है और उनको हिंदी साहित्य में जो दर्जा मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया है.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बच्चन के छात्र रह चुके अजित कुमार ने बीबीसी हिंदी सेवा को बताया कि बच्चन की कविताएँ व्यक्ति को हताश नहीं बनातीं बल्कि नए जीवन का संदेश देती हैं.
उन्होंने कहा कि बच्चन जवानी के कवि थे और उन्होंने लिखा भी था,"मैं गाता हूँ, इसलिए जवानी मेरी है!!"
बच्चन की कृतियों के नौ खंड में छपे संकलन का संपादन कर चुके अजित कुमार ने बच्चन के बारे में कहा,"तीस-चालीस वर्षों तक वे मधुर काव्यपाठ के द्वारा लोगों को विभोर करते रहे. उन्होंने लोगों की रुचि को ध्यान में रखते हुए अपनी कविताओं का स्तर कभी नहीं गिराया."
लेकिन उन्होंने अफ़सोस ज़ाहिर किया कि शुरूआती दौर में बच्चन को एक गंभीर लेखक के रूप में ख्याति नहीं मिली.
बच्चन की दूसरी लोकप्रिय रचनाओं में उनके काव्य संग्रह 'निशा निमंत्रण', 'एकांत संगीत', 'मिलनयामिनी', 'प्रणय पत्रिका' आदि प्रमुख हैं. |
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