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बुधवार, 18 दिसंबर, 2002 को 10:08 GMT तक के समाचार
संसद कांड में तीन को फांसी
पिछली पेशी पर अदालत के बाहर शौकत हुसैन उर्फ़ गुरू
पिछली पेशी पर अदालत के बाहर शौकत हुसैन उर्फ़ गुरू

दिल्ली की एक विशेष अदालत ने उन तीन लोगों को मौत की सज़ा सुनाने का ऐलान किया है जिन्हें पिछले साल संसद पर हुए हमले की साज़िश में शामिल होने और हमलावरों की मदद करने का दोषी पाया गया था.

पिछले साल तेरह दिसंबर को संसद पर हुए हमले में कुल 14 लोग मारे गए थे जिनमें पाँच हमलावर भी शामिल थे.


दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रवक्ता गीलानी को भी मौत की सज़ा
इसीलिए इस मामले में किसी पर भी हमले में शामिल होने का मुकदमा नहीं चला.

जिन तीन अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई गई उनपर हमलावरों की मदद करने और हमले की साज़िश में शामिल होने के अलावा भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की हत्या की साज़िश रचने का आरोप भी साबित हुआ है.

इस मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत के जज शिव नारायण ढींगरा ने बुधवार को तीन अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई.

ये तीनों हैं चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े मोहम्मद अफ़ज़ल और शौक़त हुसैन उर्फ़ गुरू और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक अध्यापक सैयद अब्दुल रहमान गीलानी.

अदालत ने सोमवार को इन तीनों को राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया था और साथ ही प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश रचने का भी.


अफ़्शाँ अपने बच्चे के साथ
गुरू की पत्नी नवजोत संधू उर्फ़ अफ़्शाँ गुरू को भी अदालत ने दोषी करार दिया था, लेकिन उनका अपराध सिर्फ़ यह था कि उन्होंने इन तीनों की साज़िश के बारे में पुलिस को सूचना नहीं दी.

अफ़्शाँ को पांच साल कैद की सज़ा सुनाई गई है.

नरमी नहीं

सभी चार अभियुक्तों ने ख़ुद को बेगुनाह बताया था और उनके वकीलों ने कहा है कि इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की जाएगी.

भारत में मौत की सज़ा तभी दी जाती है जब अदालत के फ़ैसले पर एक और ऊंची अदालत की मज़ूरी भी मिल जाए.

इस सज़ा के ख़िलाफ़ अपील के लिए बचाव पक्ष के पास एक महीने का समय है.

अदालत ने अभियुक्तों के साथ रहम करने और उन्हें मौत की सज़ा न देने की बचाव पक्ष के वकीलों की दलील ख़ारिज़ कर दी और कहा कि यह एक बहुत ही गंभीर मामला है जिसमें ऐसी सज़ा देना ज़रूरी है.

शौकत गुरु तो अदालत से बाहर आते ही चिल्लाने लगे "हम कश्मीर के लिए संघर्ष करते रहेंगे."

लेकिन गीलानी ने ख़ुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि जब तक न्याय नहीं होगा सच्चा लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता.

बचाव पक्ष की वकील नित्या रामचंद्रन भी फ़ैसले से काफ़ी नाराज़ थीं उन्होंने कहा कि यह काफ़ी कड़ी सज़ा है.

उन्होंने मीडिया पर भी ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार का आरोप लगाया.

उधर फ़ैसला होते ही अदालत के बाहर शिवसैनिकों ने पटाखे छोड़ने शुरू कर दिए.

वे पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नारे भी लगा रहे थे.
 
 
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