|
|
 |
बुधवार, 27 नवंबर, 2002 को 18:32 GMT तक के समाचार गोरखा सैनिकों को मुआवज़ा
|

पूर्वी तिमोर में गोरखा सैनिक
|
द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रितानी सेना में रह चुके तीन गोरखा सैनिकों ने ब्रितानी सरकार के ख़िलाफ़ एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की है.
ब्रितानी प्रतिरक्षा मंत्रालय ने जापानियों के हाथ झेले उत्पीड़न के लिए उन्हें मुआवज़ा देने से इनकार कर दिया था.
इस आदेश को गोरखा सैनिकों ने चुनौती दी थी और उन्हें 10, 000 पाउंड या सात लाख रुपए मुआवज़ा दिया जाएगा.
इन तीन सैनिकों के वकीलों का तर्क था कि ये तीनो ब्रितानी सैनिक थे और सरकार ने इन्हें मुआवज़ा देने से मना कर भेदभाव और नस्लवाद की नीति अपनाई.
अब इन तीनों सैनिकों को पूर्व युद्धबंदियों के लिए स्थापित विशेष कोष से अनुदान मिलेगा.
अब लगभग 300 ज़िंदा गोरखा सैनिकों को शायद इस निर्णय का फायदा मिल सके.
गोरखा सैनिकों के वकील फिल शाइनर का कहना है, " गोरखा सैनिकों ने कई युद्धों में ब्रिटेन के प्रति अपना समर्पण और निष्ठा दिखाई है."
जिन तीन गोरखा सैनिकों का मामला अदालत में आया था उनकी उम्र 80 साल के करीब है और वे नेपाल में रह रहे हैं.
इनके नाम है पहलमान गुरूंग, गौरीसर थापा और हुकुम सिंह पुन.
पहलमान गुरुंग ने बीबीसी से कहा, "मै इस जीत से बहुत ख़ुश हूँ. मैने ब्रितानी सरकार की निष्ठा से सेवा की और जापानियों के हाथ बहुत ज़ुल्म सहे."
"81 वर्ष की आयु में मेरे योगदान को पहचाना गया यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. हमारे लिए यह उसूल का सवाल था कि ब्रिटेन हमारे योगदान को पहचानें और हमसे बराबरी का सलूक करें. "
अगले साल के शुरु में इस मामले में मुख्य मुक़दमा चलाया जाएगा जिसमें वेतन और पेंशन में उनके साथ हुए भेदभाव पर विचार किया जाएगा.
यदि गोरखा आगे होने वाले मुकदमे जीत जाते है तो ब्रिटिश सरकार को दो अरब पाऊंड का खर्च भुगतना पड़ सकता है. |
|
|
|